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एक समय था जब बायजूस को भारत की सबसे बड़ी स्टार्टअप सफलता की कहानी माना जाता था। कंपनी का लोगो भारतीय क्रिकेट टीम की जर्सी पर दिखता था, दुनिया के बड़े निवेशक इसमें पैसा लगाने के लिए कतार में खड़े रहते थे और इसके संस्थापक बायजू रविंद्रन को नए भारत के सबसे सफल उद्यमियों में गिना जाता था। लेकिन आज वही कंपनी कानूनी विवादों, कर्ज और टूटे हुए भरोसे का प्रतीक बन चुकी है। सिंगापुर की अदालत ने बायजू रविंद्रन को अदालत की अवमानना के मामले में छह महीने की जेल की सजा सुनाई है। उन पर संपत्तियों से जुड़े दस्तावेज छिपाने और अदालत के आदेशों का पालन न करने का आरोप साबित हुआ है। यह सिर्फ एक कंपनी के पतन की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब स्टार्टअप दुनिया में तेजी से बढ़ना ही सबसे बड़ी सफलता माना जाने लगा था।
एक शिक्षक से अरबपति बनने तक का सफर
बायजू रविंद्रन का सफर बेहद साधारण पृष्ठभूमि से शुरू हुआ था। केरल के एक छोटे से कस्बे में जन्मे रविंद्रन स्कूल शिक्षक के बेटे थे। शुरुआत में वे एक शिपिंग कंपनी में इंजीनियर थे, लेकिन बाद में उन्होंने छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराना शुरू किया। उनकी पढ़ाने की शैली अलग थी। वे गणित को कठिन विषय नहीं बल्कि दिलचस्प चुनौती की तरह पेश करते थे। धीरे-धीरे उनके क्लासरूम स्टेडियम में बदलने लगे। हजारों छात्र उनके सेशन में आने लगे। यहीं से “थिंक एंड लर्न” की नींव पड़ी, जिसे बाद में दुनिया ने “बायजूस” के नाम से जाना।
महामारी ने बदल दी कंपनी की किस्मत
साल 2020 में कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को ऑनलाइन शिक्षा की ओर धकेल दिया। स्कूल बंद हो गए, बच्चे घरों में कैद हो गए और माता-पिता डिजिटल पढ़ाई को मजबूरी के रूप में अपनाने लगे। बायजूस के लिए यह सबसे बड़ा अवसर साबित हुआ। कंपनी की डाउनलोड संख्या तेजी से बढ़ी। विदेशी निवेशकों ने अरबों डॉलर का निवेश किया। साल 2022 तक कंपनी की वैल्यूएशन 22 अरब डॉलर यानी करीब 2 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गई। यह भारत की सबसे मूल्यवान स्टार्टअप बन गई थी। कंपनी ने तेजी से विस्तार शुरू किया। आकाश एजुकेशनल सर्विसेज, व्हाइटहैट जूनियर, ग्रेट लर्निंग और एपिक जैसी कंपनियों का अधिग्रहण किया गया। विज्ञापनों, क्रिकेट स्पॉन्सरशिप और ग्लोबल ब्रांडिंग पर भारी खर्च हुआ। लेकिन यहीं से कंपनी ने अपनी सबसे बड़ी गलती भी शुरू कर दी।
तेज विस्तार की कीमत कंपनी को भारी पड़ी
बायजूस ने यह मान लिया था कि महामारी के दौरान बनी ऑनलाइन पढ़ाई की मांग हमेशा बनी रहेगी। लेकिन जैसे ही स्कूल खुले, छात्रों की रुचि फिर से ऑफलाइन पढ़ाई की ओर लौटने लगी। कंपनी का खर्च लगातार बढ़ता गया, लेकिन कमाई उस गति से नहीं बढ़ पाई। बड़े अधिग्रहणों को संभालना मुश्किल होने लगा। इसी दौरान निवेशकों ने सवाल पूछने शुरू किए। कंपनी की वित्तीय रिपोर्ट समय पर नहीं आई। घाटा बढ़ता गया। वित्त वर्ष 2021 में कंपनी का घाटा 4,588 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। यह आंकड़ा निवेशकों के लिए बड़ा झटका था। 1.2 अरब डॉलर का कर्ज बना सबसे बड़ा संकट
नवंबर 2021 में बायजूस ने विदेशी निवेशकों से 1.2 अरब डॉलर यानी करीब 11 हजार करोड़ रुपए का टर्म लोन लिया। उस समय इसे भारतीय स्टार्टअप सेक्टर की बड़ी उपलब्धि बताया गया था। लेकिन यही कर्ज बाद में कंपनी के लिए सबसे बड़ा संकट बन गया। विदेशी कर्जदाताओं ने आरोप लगाया कि करीब 533 मिलियन डॉलर यानी लगभग 5,100 करोड़ रुपए की राशि को जटिल कॉरपोरेट ढांचे के जरिए इधर-उधर ट्रांसफर किया गया। अमेरिका और ब्रिटेन की अदालतों में यह मामला पहुंच गया। निवेशकों ने कंपनी पर पारदर्शिता की कमी और फंड के गलत इस्तेमाल के आरोप लगाए। हालांकि बायजू रविंद्रन ने लगातार इन आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि पैसा वैध कारोबारी जरूरतों के लिए इस्तेमाल हुआ।
कर्मचारियों की छंटनी और निवेशकों का टूटता भरोसा
कंपनी की आर्थिक स्थिति खराब होने का असर सबसे पहले कर्मचारियों पर पड़ा। हजारों कर्मचारियों की छंटनी हुई। कई महीनों तक सैलरी में देरी की शिकायतें सामने आईं। इसी दौरान कंपनी के ऑडिटर डेलॉइट ने इस्तीफा दे दिया। कई बोर्ड सदस्यों ने भी पद छोड़ दिया। कॉरपोरेट दुनिया में ऑडिटर का इस्तीफा बेहद गंभीर संकेत माना जाता है। इससे निवेशकों का भरोसा और कमजोर हो गया। धीरे-धीरे कंपनी की वैल्यूएशन गिरती चली गई। जो कंपनी कभी 22 अरब डॉलर की थी, उसकी कीमत लगभग शून्य तक पहुंच गई। फोर्ब्स ने भी बायजू रविंद्रन की नेटवर्थ को “जीरो” घोषित कर दिया।
क्रिकेट स्पॉन्सरशिप से शुरू हुई दिवाला प्रक्रिया
भारत में कंपनी की मुश्किलें तब और बढ़ीं जब भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई ने 158 करोड़ रुपए के बकाया भुगतान के लिए नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया। जुलाई 2024 में एनसीएलटी ने बायजूस के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया शुरू कर दी। विडंबना यह रही कि जिस क्रिकेट स्पॉन्सरशिप ने कंपनी को देशभर में पहचान दिलाई, वही उसके कानूनी संकट की वजह बन गई। अब कंपनी अपने सबसे महत्वपूर्ण एसेट “आकाश एजुकेशनल सर्विसेज” पर भी नियंत्रण खोने के खतरे का सामना कर रही है।
सिंगापुर कोर्ट का फैसला क्यों है बेहद अहम
सिंगापुर की अदालत का हालिया फैसला बायजू रविंद्रन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। अदालत ने पाया कि उन्होंने अप्रैल 2024 से लगातार अपनी संपत्तियों से जुड़े दस्तावेज पेश करने के आदेशों का पालन नहीं किया। कोर्ट ने उन्हें छह महीने की जेल की सजा सुनाई और 90 हजार सिंगापुर डॉलर यानी करीब 67 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया। इसके अलावा उन्हें “बीआर इन्वेस्टको पीटीई” नाम की कंपनी से जुड़े स्वामित्व दस्तावेज जमा करने का आदेश दिया गया है। यह मामला कतर इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी की एक सहायक कंपनी द्वारा दायर किया गया था, जिसने संकट के दौर में बायजूस में निवेश किया था।
क्या बायजूस की कहानी भारतीय स्टार्टअप सेक्टर के लिए चेतावनी है?
बायजूस का पतन सिर्फ एक कंपनी की असफलता नहीं है। यह भारतीय स्टार्टअप दुनिया के लिए एक बड़ा सबक भी है। इस कहानी ने दिखाया कि सिर्फ तेजी से बढ़ना किसी कंपनी को लंबे समय तक सफल नहीं बना सकता। मजबूत वित्तीय अनुशासन, पारदर्शिता और संतुलित विस्तार उतना ही जरूरी है। महामारी के दौर में निवेशकों ने कंपनियों को बिना ज्यादा सवाल पूछे अरबों डॉलर दिए। लेकिन जब बाजार की परिस्थितियां बदलीं, तो वही कंपनियां भारी दबाव में आ गईं। बायजूस ने शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाने का सपना जरूर दिखाया, लेकिन अत्यधिक विस्तार, भारी कर्ज और कमजोर प्रबंधन ने उस सपने को बिखेर दिया।
निष्कर्ष:
बायजूस की कहानी यह साबित करती है कि किसी कंपनी का सबसे बड़ा दुश्मन हमेशा असफलता नहीं होती, कई बार अनियंत्रित सफलता भी विनाश का कारण बन जाती है। एक शिक्षक के छोटे से क्लासरूम से शुरू हुआ सफर दुनिया की सबसे बड़ी एडटेक कंपनियों में पहुंचा, लेकिन वही कंपनी आज अदालतों, कर्ज और टूटे हुए भरोसे के बीच संघर्ष कर रही है।