सोना बना दुनिया के केंद्रीय बैंकों की पहली पसंद! वैश्विक भंडार में हिस्सेदारी 27% पहुंची

अमेरिकी बॉन्ड और यूरो को छोड़ा पीछे

दुनिया की वित्तीय व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। दशकों तक केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी सरकारी बॉन्ड और यूरो का दबदबा रहा, लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 के अंत तक वैश्विक केंद्रीय बैंकों के कुल आधिकारिक भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़कर 27% पहुंच गई है। यह अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की 22% हिस्सेदारी और यूरो की 15% हिस्सेदारी से अधिक है। यह केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि वैश्विक वित्तीय सोच में आ रहे बदलाव का संकेत है। बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, मुद्रा बाजार की अनिश्चितता और सुरक्षित निवेश की तलाश ने केंद्रीय बैंकों को फिर से सोने की ओर आकर्षित किया है।
वैश्विक भंडार में सोने की हिस्सेदारी क्यों बढ़ी? 
केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित और स्थिर रखने के लिए अलग-अलग परिसंपत्तियों में निवेश करते हैं। इनमें विदेशी मुद्राएं, सरकारी बॉन्ड और सोना शामिल होता है। यूरोपीय केंद्रीय बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 के अंत तक सोना कुल आधिकारिक भंडार का 27% हिस्सा बन गया। इसके मुकाबले अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की हिस्सेदारी 22% और यूरो की हिस्सेदारी 15% रही। हालांकि इसका बड़ा कारण केवल खरीदारी नहीं, बल्कि सोने की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी भी है। वर्ष 2025 में सोने की कीमत करीब 60% बढ़ी, जबकि 2024 में इसमें लगभग 30% की तेजी आई थी। इसी वजह से केंद्रीय बैंकों के पास मौजूद सोने का मूल्य तेजी से बढ़ा।
केंद्रीय बैंक क्यों बढ़ा रहे हैं सोने का भंडार?
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने कई बड़े भू-राजनीतिक संकट देखे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक व्यापारिक टकरावों ने वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ाई है। ऐसे माहौल में केंद्रीय बैंक ऐसी परिसंपत्ति चाहते हैं जिस पर किसी देश या सरकार का नियंत्रण न हो। सोना इस जरूरत को पूरा करता है। यह न तो किसी देश की मुद्रा है और न ही किसी सरकार की देनदारी। यही वजह है कि कई देशों के केंद्रीय बैंक लगातार सोना खरीद रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार 2022 के बाद से चीन ने 350 टन से अधिक, पोलैंड ने 320 टन, तुर्किये ने 220 टन और भारत ने लगभग 130 टन सोना खरीदा है।
2025 में किन देशों ने सबसे ज्यादा सोना खरीदा?
वर्ष 2025 में भी केंद्रीय बैंकों की खरीदारी मजबूत बनी रही। कुल मिलाकर करीब 850 टन सोना खरीदा गया। हालांकि यह 2022-24 के दौरान खरीदे गए 1,000 टन से अधिक के स्तर से थोड़ा कम है, लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि से यह अभी भी बहुत ऊंचा आंकड़ा है। सबसे बड़े खरीदारों में पोलैंड पहले स्थान पर रहा। इसके बाद कजाकिस्तान, ब्राजील, चीन और तुर्किये का नाम शामिल रहा। यह साफ दिखाता है कि दुनिया के कई देश अपने भंडार में विविधता ला रहे हैं और केवल डॉलर आधारित परिसंपत्तियों पर निर्भर नहीं रहना चाहते।
क्या अमेरिकी डॉलर की ताकत कम हो रही है?
यह सवाल निवेशकों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा में है। हालांकि सोने की हिस्सेदारी बढ़ी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि डॉलर का दबदबा खत्म हो गया है। वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी अभी भी लगभग 57% है, जबकि यूरो करीब 20% हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर बना हुआ है। यानी डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे प्रमुख आरक्षित मुद्रा है। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि केंद्रीय बैंक अब अपने जोखिम को कम करने के लिए सोने का महत्व बढ़ा रहे हैं।
सोने की बढ़ती कीमतों ने कैसे बदली तस्वीर?
सोने की हिस्सेदारी बढ़ने का एक बड़ा कारण उसकी कीमत में रिकॉर्ड तेजी भी है। जब किसी केंद्रीय बैंक के पास पहले से रखा सोना महंगा हो जाता है, तो उसके कुल भंडार में सोने का प्रतिशत अपने आप बढ़ जाता है। यूरोपीय केंद्रीय बैंक ने भी माना है कि 27% की हिस्सेदारी का बड़ा हिस्सा मूल्य वृद्धि का परिणाम है। अगर सोने की कीमतों को वर्ष 2023 के स्तर पर मानकर गणना की जाए तो सोने और यूरो दोनों की हिस्सेदारी लगभग 16% के आसपास रहती है, जबकि अमेरिकी बॉन्ड की हिस्सेदारी अभी भी 26% रहती है। इससे स्पष्ट है कि मौजूदा आंकड़ों में कीमतों की तेजी का बड़ा योगदान है।
भारत के लिए इसका क्या मतलब है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देशों में शामिल है। भारतीय रिजर्व बैंक भी पिछले कुछ वर्षों से लगातार सोना खरीद रहा है। वैश्विक केंद्रीय बैंकों की बढ़ती मांग का असर भारत पर भी पड़ सकता है। यदि केंद्रीय बैंक भविष्य में भी बड़े पैमाने पर खरीदारी जारी रखते हैं तो सोने की कीमतों को मजबूत समर्थन मिलता रह सकता है। इसके अलावा, वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने पर निवेशक भी सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने की ओर रुख कर सकते हैं। इससे घरेलू बाजार में सोने की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं।
निवेशकों को किन बातों पर नजर रखनी चाहिए?
 सोने की कीमतों की दिशा आने वाले महीनों में कई कारकों पर निर्भर करेगी।
● केंद्रीय बैंकों की खरीदारी का रुझान
● वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव
● अमेरिकी ब्याज दरों की दिशा
● डॉलर की मजबूती या कमजोरी
● वैश्विक आर्थिक विकास की रफ्तार यदि दुनिया में अनिश्चितता बनी रहती है तो सोना सुरक्षित निवेश के रूप में आकर्षण बनाए रख सकता है। वहीं ब्याज दरों में गिरावट भी सोने के पक्ष में जा सकती है।
क्या सोना भविष्य का सबसे बड़ा आरक्षित साधन बन सकता है?
सोने की बढ़ती हिस्सेदारी निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण संकेत है, लेकिन इसकी भी कुछ सीमाएं हैं। सोना कोई ब्याज नहीं देता, इसकी कीमतों में उतार-चढ़ाव होता है और इसे सुरक्षित रखने की लागत भी आती है। इसके बावजूद केंद्रीय बैंकों की रणनीति स्पष्ट दिखाई दे रही है। वे केवल डॉलर और बॉन्ड पर निर्भर रहने के बजाय अपने भंडार को अधिक संतुलित और सुरक्षित बनाना चाहते हैं।
निष्कर्ष:
वैश्विक केंद्रीय बैंकों के भंडार में सोने की हिस्सेदारी का 27% तक पहुंचना केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं, बल्कि बदलती आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों का प्रतिबिंब है। अमेरिकी बॉन्ड और यूरो को पीछे छोड़ना यह दर्शाता है कि अनिश्चितता के दौर में दुनिया अब भी सोने को सबसे भरोसेमंद सुरक्षा कवच मानती है। निवेशकों के लिए यह संकेत महत्वपूर्ण है। भले ही सोना अल्पकाल में उतार-चढ़ाव दिखाए, लेकिन केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीदारी यह बताती है कि दीर्घकाल में इसकी रणनीतिक अहमियत बरकरार है। आने वाले वर्षों में यदि वैश्विक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता बनी रहती है, तो सोना केवल एक धातु नहीं बल्कि दुनिया की वित्तीय सुरक्षा का सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभर सकता है।