सोना-चांदी में आई बड़ी गिरावट, लेकिन क्या खरीदारी का मौका है? 

जानिए पूरी कहानी

अगर आपको लगता है कि वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव के बीच सोने की कीमतों में लगातार तेजी आनी चाहिए थी, तो शुक्रवार का बाजार आपको चौंका सकता है। सुरक्षित निवेश (Safe Haven) माने जाने वाले सोने और चांदी दोनों में गिरावट दर्ज की गई। पहली नजर में यह विरोधाभासी लग सकता है, लेकिन इसके पीछे वैश्विक बाजारों की कई परतें काम कर रही हैं। शुक्रवार, 17 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय बाजार में COMEX पर सोना 0.12% गिरकर 3,987.50 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार करता दिखा, जबकि चांदी 1.24% फिसलकर 55.49 डॉलर प्रति औंस पर आ गई। घरेलू वायदा बाजार एमसीएक्स (MCX) में भी शुरुआती कारोबार के दौरान सोने और चांदी में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। ऐसे में निवेशकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह केवल मुनाफावसूली है या फिर बुलियन बाजार में बड़ी कमजोरी की शुरुआत? यहीं से कहानी दिलचस्प हो जाती है। एक तरफ भू-राजनीतिक तनाव सोने को सहारा दे रहा है, वहीं दूसरी ओर डॉलर, ब्याज दरों की उम्मीदें और निवेशकों की रणनीति कीमतों पर दबाव बना रही हैं।
आज सोने और चांदी की कीमतें क्यों गिरीं?
हाल के दिनों में सोने और चांदी में तेज तेजी देखने को मिली थी। ऐसे में कई निवेशकों ने ऊंचे स्तर पर मुनाफावसूली करना बेहतर समझा। यही वजह रही कि शुक्रवार को कीमतों में दबाव देखने को मिला। चांदी में गिरावट सोने से अधिक रही क्योंकि इसकी कीमत केवल सुरक्षित निवेश की मांग पर निर्भर नहीं करती, बल्कि औद्योगिक मांग भी इसकी दिशा तय करती है। जब वैश्विक आर्थिक संकेत कमजोर दिखाई देते हैं, तो चांदी में उतार-चढ़ाव अपेक्षाकृत ज्यादा बढ़ जाता है।
वेस्ट एशिया का तनाव अभी भी बाजार को सहारा दे रहा है
हालांकि कीमतों में गिरावट आई है, लेकिन सोने की कमजोरी फिलहाल सीमित दिखाई दे रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह वेस्ट एशिया में बढ़ता तनाव है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। इसी कारण ब्रेंट क्रूड लगभग 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। जब वैश्विक तनाव बढ़ता है, तो निवेशक शेयर बाजार जैसे जोखिम वाले निवेश से निकलकर सोने जैसी सुरक्षित संपत्तियों की ओर रुख करते हैं। यही कारण है कि मुनाफावसूली के बावजूद सोने में बड़ी गिरावट देखने को नहीं मिली।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व क्यों बना सबसे बड़ा फैक्टर?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आगे सोने की दिशा कौन तय करेगा? इसका जवाब काफी हद तक अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति में छिपा है। हाल के महंगाई आंकड़ों ने यह उम्मीद जरूर बढ़ाई है कि फेड भविष्य में ब्याज दरों को लेकर पहले जितना आक्रामक नहीं रहेगा। आमतौर पर जब ब्याज दरें कम होती हैं, तो सोना मजबूत होता है क्योंकि यह कोई ब्याज नहीं देता और कम ब्याज दरों के माहौल में इसकी अवसर लागत घट जाती है। लेकिन अगर महंगाई फिर से बढ़ती है और फेड दरों में कटौती टाल देता है, तो सोने पर दबाव बढ़ सकता है।
डॉलर और कच्चे तेल की चाल क्यों अहम है?
अमेरिकी डॉलर इंडेक्स लगभग 100.78 के स्तर पर बना हुआ है। मजबूत डॉलर का मतलब है कि अन्य देशों के खरीदारों के लिए सोना महंगा हो जाता है, जिससे मांग पर असर पड़ सकता है। दूसरी तरफ कच्चे तेल की ऊंची कीमतें महंगाई बढ़ा सकती हैं। यदि महंगाई लगातार ऊंची रहती है तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रख सकते हैं। यही वजह है कि तेल और डॉलर दोनों पर निवेशकों की नजर बनी हुई है।
विशेषज्ञों की राय:
कमोडिटी बाजार के जानकारों का मानना है कि फिलहाल सोने और चांदी में अस्थिरता बनी रह सकती है। विश्लेषकों के अनुसार एमसीएक्स पर सोने के लिए ₹1,40,000–₹1,40,400 प्रति 10 ग्राम का स्तर अहम सपोर्ट माना जा रहा है। यदि यह स्तर टूटता है तो गिरावट और गहरी हो सकती है। दूसरी ओर ₹1,41,100 से ₹1,45,000 का दायरा मजबूत प्रतिरोध के रूप में देखा जा रहा है। चांदी के लिए ₹2.14 लाख प्रति किलोग्राम के आसपास का स्तर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जबकि ऊपर की ओर ₹2.18 लाख से ₹2.21 लाख का क्षेत्र प्रमुख प्रतिरोध हो सकता है।
अब इन 5 कारणों से तय होगी सोने-चांदी की अगली चाल
आने वाले दिनों में बुलियन बाजार की दिशा मुख्य रूप से इन पांच कारकों पर निर्भर करेगी -
1. वेस्ट एशिया में युद्ध और भू-राजनीतिक घटनाक्रम
तनाव बढ़ने पर सुरक्षित निवेश की मांग तेज हो सकती है।
2. कच्चे तेल की कीमतें
तेल महंगा रहने पर महंगाई और ब्याज दरों की चिंता बढ़ेगी।
3. अमेरिकी फेडरल रिजर्व के संकेत
दरों में कटौती या सख्ती दोनों का सीधा असर सोने पर पड़ेगा।
4. अमेरिकी डॉलर की मजबूती या कमजोरी
डॉलर मजबूत होने पर सोने की वैश्विक मांग प्रभावित हो सकती है।
5. वैश्विक निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता
यदि शेयर बाजारों में तेजी बनी रहती है तो सोने से पैसा निकल सकता है, जबकि अनिश्चितता बढ़ने पर सुरक्षित निवेश की मांग मजबूत हो सकती है।
निवेशकों को अभी क्या रणनीति अपनानी चाहिए?
अगर आप लंबी अवधि के निवेशक हैं तो केवल एक-दो दिन की गिरावट को ट्रेंड बदलने का संकेत नहीं मानना चाहिए। हालांकि अल्पकालिक निवेशकों के लिए बाजार अभी भी काफी अस्थिर बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि नए निवेश से पहले वैश्विक घटनाक्रम, फेडरल रिजर्व की अगली टिप्पणी और डॉलर की चाल पर नजर रखना ज्यादा समझदारी होगी। वहीं चांदी में निवेश करने वालों को यह ध्यान रखना चाहिए कि इसकी कीमतें औद्योगिक मांग से भी प्रभावित होती हैं, इसलिए इसमें उतार-चढ़ाव सोने से अधिक रह सकता है।
निष्कर्ष 
सोने और चांदी में शुक्रवार की गिरावट के पीछे मुख्य वजह मुनाफावसूली रही, लेकिन वैश्विक तस्वीर अभी भी पूरी तरह कमजोर नहीं हुई है। वेस्ट एशिया का तनाव, कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीति, डॉलर इंडेक्स और वैश्विक जोखिम भावना आने वाले दिनों में बुलियन बाजार की दिशा तय करेंगे। निवेशकों के लिए सबसे बड़ा अवसर किसी भी तेज गिरावट पर चरणबद्ध निवेश हो सकता है, जबकि सबसे बड़ा जोखिम ब्याज दरों के लंबे समय तक ऊंचे बने रहने और डॉलर की मजबूती से जुड़ा है। इसलिए जल्दबाजी के बजाय आंकड़ों और वैश्विक घटनाक्रम पर नजर रखते हुए निवेश रणनीति बनाना अधिक उपयुक्त रहेगा।