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भारतीय आईवियर बाजार की दिग्गज कंपनी लेंसकार्ट एक बार फिर सुर्खियों में है। कुछ ही दिनों पहले सॉफ्टबैंक ने कंपनी में अपनी हिस्सेदारी का हिस्सा बेचकर हजारों करोड़ रुपये निकाले थे और अब दुनिया के सबसे बड़े संप्रभु निवेश कोषों में शामिल अबू धाबी निवेश प्राधिकरण (एडीआईए) ने भी आंशिक निकासी का रास्ता चुना है। करीब ₹1,862 करोड़ की ब्लॉक डील में 3.8 करोड़ से अधिक शेयरों का हाथ बदलना बाजार के लिए बड़ा घटनाक्रम है। सवाल यह है कि क्या बड़े निवेशकों का बाहर निकलना कंपनी के भविष्य को लेकर किसी चिंता का संकेत है या फिर यह केवल शुरुआती निवेशकों की सामान्य मुनाफावसूली है? इस पूरे घटनाक्रम को समझना निवेशकों के लिए बेहद जरूरी है।
₹1,862 करोड़ की ब्लॉक डील ने बढ़ाई बाजार की हलचल
गुरुवार को बाजार खुलने से पहले लेंसकार्ट के लगभग 3.8 करोड़ शेयरों की बड़ी ब्लॉक डील हुई। यह कंपनी की कुल इक्विटी का करीब 2.2 प्रतिशत हिस्सा है। यह सौदा ₹490 प्रति शेयर के भाव पर हुआ, जो पिछले कारोबारी सत्र के बंद भाव ₹500.15 से लगभग 2 प्रतिशत कम था। बड़ी मात्रा में शेयर बिकने के कारण शुरुआती कारोबार में शेयर दबाव में दिखा और एक प्रतिशत से अधिक गिरावट के साथ खुला। हालांकि बाद में खरीदारों की सक्रियता से शेयर में सुधार भी देखने को मिला।
आखिर कौन बेच रहा है लेंसकार्ट के शेयर?
इस डील के पीछे एडीआईए समर्थित निवेश इकाई प्लेटिनम जैस्मीन ए 2018 ट्रस्ट का नाम सामने आया है। रिपोर्टों के अनुसार यह निवेशक कंपनी में अपनी लगभग 2.3 प्रतिशत हिस्सेदारी कम करना चाहता था। इसके लिए करीब 4 करोड़ शेयर बिक्री के लिए पेश किए गए। दिलचस्प बात यह है कि सौदे के बाद बची हुई हिस्सेदारी पर 90 दिनों का लॉक-इन लागू रहेगा। इसका मतलब है कि अगले तीन महीने तक यह निवेशक अपने शेष शेयर नहीं बेच सकेगा।
सॉफ्टबैंक के बाद दूसरी बड़ी निकासी, क्या संकेत मिल रहे हैं?
लेंसकार्ट में यह हालिया समय की दूसरी बड़ी हिस्सेदारी बिक्री है। कुछ दिन पहले ही सॉफ्टबैंक ने अपनी 3.25 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचकर लगभग ₹2,873 करोड़ जुटाए थे। उससे पहले भी मई में 11 करोड़ से अधिक शेयरों की ब्लॉक डील हुई थी। यानी पिछले एक महीने में लेंसकार्ट में लगातार तीसरी बड़ी हिस्सेदारी बिक्री हुई है। पहली नजर में यह चिंता का विषय लग सकता है, लेकिन बाजार विशेषज्ञ इसे अलग नजरिए से देखते हैं। उनका मानना है कि कंपनी के शुरुआती निवेशक वर्षों पहले कम मूल्यांकन पर निवेश कर चुके थे। अब सूचीबद्ध होने के बाद वे अपने निवेश का कुछ हिस्सा भुना रहे हैं।
बिकवाली के बावजूद कौन खरीद रहा है इतने बड़े शेयर?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि जब बड़े निवेशक बेच रहे हैं तो खरीद कौन रहा है? यही वह पहलू है जो लेंसकार्ट की कहानी को मजबूत बनाता है। सॉफ्टबैंक की बिक्री के दौरान गोल्डमैन सैक्स, फिडेलिटी, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल, कोटक, क्वांट, मिरे एसेट और एचडीएफसी लाइफ जैसे बड़े संस्थागत निवेशकों ने खरीदारी की थी। इससे संकेत मिलता है कि बड़े घरेलू और विदेशी निवेशक अब भी लेंसकार्ट के दीर्घकालिक भविष्य पर भरोसा रखते हैं।
कारोबार के मोर्चे पर कंपनी कितनी मजबूत है?
यदि वित्तीय प्रदर्शन पर नजर डालें तो तस्वीर काफी सकारात्मक दिखाई देती है। जनवरी से मार्च 2026 तिमाही में कंपनी का राजस्व 46 प्रतिशत बढ़कर ₹2,516 करोड़ पहुंच गया। एक साल पहले समान अवधि में यह ₹1,727 करोड़ था। कंपनी का परिचालन लाभ 84 प्रतिशत बढ़कर ₹538 करोड़ हो गया। लाभ मार्जिन भी 16.9 प्रतिशत से बढ़कर 21.4 प्रतिशत पहुंच गया। हालांकि शुद्ध लाभ में हल्की गिरावट देखने को मिली और यह ₹219 करोड़ से घटकर ₹200 करोड़ रह गया।
पूरे वर्ष के आंकड़े क्यों बढ़ा रहे हैं भरोसा?
पूरे वित्त वर्ष 2026 की बात करें तो कंपनी का प्रदर्शन और भी मजबूत दिखाई देता है। वार्षिक राजस्व 32 प्रतिशत बढ़कर ₹9,002 करोड़ पहुंच गया। वहीं समायोजित लाभ में 148 प्रतिशत की शानदार वृद्धि दर्ज हुई और यह ₹530 करोड़ तक पहुंच गया। यह आंकड़े बताते हैं कि कंपनी सिर्फ बिक्री बढ़ाने पर नहीं बल्कि लाभप्रदता सुधारने पर भी काम कर रही है। भारत में बढ़ते आईवियर बाजार, डिजिटल बिक्री और मजबूत खुदरा नेटवर्क का फायदा कंपनी को लगातार मिल रहा है।
ब्रोकरेज कंपनियां क्यों हैं उत्साहित?
बाजार की प्रमुख शोध संस्थाएं अब भी लेंसकार्ट को लेकर सकारात्मक रुख बनाए हुए हैं। एक प्रमुख वैश्विक ब्रोकरेज ने कंपनी के लिए ₹600 का लक्ष्य मूल्य तय किया है, जो मौजूदा स्तर से लगभग 20 प्रतिशत अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगले तीन वर्षों में कंपनी का परिचालन लाभ 35 प्रतिशत से अधिक की वार्षिक दर से बढ़ सकता है। मजबूत ब्रांड, बढ़ती बाजार हिस्सेदारी और ओमनीचैनल मॉडल को इसकी सबसे बड़ी ताकत माना जा रहा है।
निवेशकों के लिए सबसे बड़ा संदेश क्या है?
लेंसकार्ट में हो रही लगातार ब्लॉक डील्स को केवल बिकवाली के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। सच्चाई यह है कि शुरुआती निवेशक मुनाफावसूली कर रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ बड़े संस्थागत निवेशक उन्हीं शेयरों को खरीद भी रहे हैं। यह किसी कमजोर कंपनी की नहीं बल्कि परिपक्व होते निवेश चक्र की पहचान है। अल्पकाल में बड़ी ब्लॉक डील्स शेयर पर दबाव बना सकती हैं, क्योंकि शेयर छूट पर बेचे जाते हैं। लेकिन दीर्घकालिक निवेशकों के लिए कंपनी की मूलभूत स्थिति, आय वृद्धि और बाजार नेतृत्व अधिक महत्वपूर्ण हैं।
निष्कर्ष:
लेंसकार्ट की मौजूदा कहानी दो तस्वीरें दिखाती है। पहली तस्वीर में शुरुआती निवेशक अपने निवेश का लाभ निकाल रहे हैं। दूसरी तस्वीर में बड़े संस्थागत निवेशक कंपनी के भविष्य पर दांव लगा रहे हैं। ₹1,862 करोड़ की यह महाडील बाजार में चर्चा जरूर पैदा करती है, लेकिन फिलहाल कंपनी के कारोबार में कमजोरी का कोई संकेत नहीं देती। निवेशकों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि वे ब्लॉक डील और कंपनी के मूल कारोबार में फर्क समझें। आने वाले महीनों में यदि राजस्व वृद्धि और लाभप्रदता का यही सिलसिला जारी रहता है, तो लेंसकार्ट की कहानी सिर्फ हिस्सेदारी बिक्री की नहीं बल्कि भारत की सबसे सफल उपभोक्ता कंपनियों में शामिल होने की भी हो सकती है।