भारतीय कंपनियों का विदेशी निवेश आधा हुआमई में 49% गिरावट 

फिर भी सालाना आधार पर मजबूत बढ़त

भारत की कंपनियों ने मई 2026 में विदेशों में निवेश की रफ्तार काफी धीमी कर दी। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारतीय कंपनियों की कुल विदेशी निवेश प्रतिबद्धताएं मई में घटकर 4.49 अरब डॉलर रह गईं, जो अप्रैल के 8.84 अरब डॉलर की तुलना में लगभग 49% कम है। हालांकि पहली नजर में यह गिरावट चिंता बढ़ाने वाली लग सकती है, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू काफी सकारात्मक है। पिछले वर्ष मई 2025 की तुलना में विदेशी निवेश प्रतिबद्धताओं में 34.6% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इससे साफ है कि भारतीय कंपनियां वैश्विक विस्तार की रणनीति पर अब भी कायम हैं, लेकिन निवेश की गति और समय में बदलाव देखने को मिल रहा है।
मई में विदेशी निवेश में बड़ी गिरावट क्यों आई?
मई 2026 में विदेशी निवेश प्रतिबद्धताओं में आई गिरावट का मुख्य कारण तीन प्रमुख क्षेत्रों में कमी रही। इनमें विदेशों में इक्विटी निवेश, ऋण और गारंटी शामिल हैं। अप्रैल में कई बड़े निवेश सौदे पूरे हुए थे, जिसके कारण उस महीने का आंकड़ा असाधारण रूप से ऊंचा था। मई में नए बड़े सौदों की संख्या कम रहने से कुल निवेश प्रतिबद्धताएं घट गईं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट किसी कमजोरी का संकेत नहीं बल्कि निवेश चक्र का सामान्य उतार-चढ़ाव है।
इक्विटी निवेश में सबसे बड़ी गिरावट
विदेशों में सीधे हिस्सेदारी खरीदने या नई इकाइयों में निवेश करने के लिए भारतीय कंपनियों द्वारा किया गया इक्विटी निवेश मई में तेजी से घटा। मई 2026 में इक्विटी निवेश 1.25 अरब डॉलर रहा, जबकि अप्रैल में यह 3.54 अरब डॉलर था। यानी एक महीने में लगभग 64.7% की गिरावट दर्ज हुई। यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारतीय कंपनियों ने मई के दौरान विदेशों में नए अधिग्रहण और विस्तार योजनाओं को अपेक्षाकृत सीमित रखा। विदेशी परियोजनाओं के लिए दिए जाने वाले ऋण भी घटे
भारतीय कंपनियां अपनी विदेशी सहयोगी कंपनियों और पूर्ण स्वामित्व वाली इकाइयों को ऋण भी उपलब्ध कराती हैं। मई में ऐसे ऋण घटकर 632.12 मिलियन डॉलर रह गए, जबकि अप्रैल में यह आंकड़ा 1.30 अरब डॉलर था। इससे संकेत मिलता है कि कंपनियों ने विदेशी परियोजनाओं के लिए नई वित्तीय सहायता देने में सावधानी बरती और नकदी प्रबंधन पर अधिक ध्यान दिया।
गारंटी अब भी सबसे बड़ा हिस्सा
विदेशी निवेश प्रतिबद्धताओं में गारंटी सबसे बड़ा घटक बनी हुई है। मई में जारी गारंटी का कुल मूल्य 2.61 अरब डॉलर रहा, जो अप्रैल के लगभग 4 अरब डॉलर से करीब 35% कम है। हालांकि दिलचस्प बात यह है कि पिछले वर्ष मई 2025 में यह आंकड़ा केवल 1.12 अरब डॉलर था। इसका मतलब है कि सालाना आधार पर गारंटी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह बताता है कि भारतीय कंपनियां अभी भी विदेशी कारोबार के लिए मजबूत वित्तीय समर्थन दे रही हैं।
किन कंपनियों ने किया सबसे बड़ा विदेशी निवेश?
मई के दौरान कुछ भारतीय कंपनियों ने विदेशों में उल्लेखनीय निवेश किया। सबसे बड़ा निवेश इंडोविडा इंडिया द्वारा किया गया, जिसने 673.2 मिलियन डॉलर का निवेश किया। इसके अलावा टाटा इंटरनेशनल ने 130 मिलियन डॉलर, अरविंद एडवांस्ड मटेरियल्स ने 58 मिलियन डॉलर और ओएनजीसी विदेश रोवुमा ने 31.09 मिलियन डॉलर का निवेश किया। इन निवेशों से स्पष्ट है कि भारतीय कंपनियां ऊर्जा, विनिर्माण और वैश्विक व्यापार जैसे क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
सालाना आधार पर तस्वीर क्यों है सकारात्मक?
मासिक गिरावट के बावजूद वर्ष-दर-वर्ष आंकड़े भारतीय कंपनियों की वैश्विक महत्वाकांक्षा को दर्शाते हैं। मई 2025 में कुल विदेशी निवेश प्रतिबद्धताएं 3.34 अरब डॉलर थीं, जो मई 2026 में बढ़कर 4.49 अरब डॉलर हो गईं। इससे पता चलता है कि भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अवसर तलाश रही हैं और वैश्विक स्तर पर अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। विशेष रूप से ऊर्जा, सूचना प्रौद्योगिकी, दवा और विनिर्माण क्षेत्र की कंपनियां विदेशों में विस्तार पर जोर दे रही हैं।
दूसरी तरफ भारत में रिकॉर्ड विदेशी निवेश आया
जहां भारतीय कंपनियों ने विदेशों में निवेश की गति कुछ धीमी की है, वहीं भारत में विदेशी निवेशकों का भरोसा लगातार मजबूत हो रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रवाह रिकॉर्ड 94.53 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह आंकड़ा बताता है कि वैश्विक निवेशक भारत की अर्थव्यवस्था, नीतियों और दीर्घकालिक विकास क्षमता पर भरोसा जता रहे हैं। सरकार की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना, विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने वाली नीतियां और तेजी से बढ़ता स्टार्टअप तंत्र निवेश आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है?
विदेशी निवेश प्रतिबद्धताओं में एक महीने की बड़ी गिरावट को अलग नजरिए से देखने की जरूरत है। यह गिरावट निवेश गतिविधियों में अस्थायी नरमी दिखाती है, लेकिन सालाना आधार पर मजबूत वृद्धि बताती है कि भारतीय कंपनियों का वैश्विक विस्तार जारी है। साथ ही भारत में रिकॉर्ड विदेशी निवेश का आना देश की आर्थिक मजबूती और निवेशकों के बढ़ते विश्वास को दर्शाता है। आने वाले महीनों में यदि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां स्थिर रहती हैं, तो भारतीय कंपनियों के विदेशी निवेश में फिर तेजी देखने को मिल सकती है।
निष्कर्ष
मई 2026 के आंकड़े एक दिलचस्प तस्वीर पेश करते हैं। एक ओर भारतीय कंपनियों की विदेशी निवेश प्रतिबद्धताएं महीने-दर-महीने लगभग आधी हो गई हैं, वहीं दूसरी ओर सालाना आधार पर मजबूत वृद्धि यह साबित करती है कि वैश्विक विस्तार की रणनीति अभी भी बरकरार है। निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि यह गिरावट किसी व्यापक कमजोरी का संकेत नहीं बल्कि निवेश चक्र में आया एक अस्थायी बदलाव है। भारत की कंपनियां वैश्विक स्तर पर अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं और देश में रिकॉर्ड विदेशी निवेश का आना इस बात का प्रमाण है कि भारत दुनिया के सबसे आकर्षक निवेश केंद्रों में बना हुआ है। आने वाले समय में यही संतुलन भारतीय अर्थव्यवस्था और बाजारों की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।