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हर महीने वेतन खाते में आने से पहले आयकर कट जाता है। उसके बाद जब कोई व्यक्ति सामान खरीदता है, होटल में खाना खाता है, मोबाइल रिचार्ज कराता है या कोई सेवा लेता है तो वस्तु एवं सेवा कर (GST) भी चुकाता है। ऐसे में अधिकांश वेतनभोगी कर्मचारियों के मन में एक सवाल बार-बार उठता है क्या भारत में टैक्स का बोझ जरूरत से ज्यादा है? यह सवाल केवल भावनाओं का नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था, निवेश और सरकारी वित्त से जुड़ा बड़ा मुद्दा है। यदि टैक्स बहुत अधिक होगा तो उपभोग और निवेश प्रभावित हो सकते हैं। वहीं यदि टैक्स कम होगा तो सरकार के पास सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे पर खर्च करने के लिए संसाधन सीमित हो जाएंगे। यही वजह है कि यह बहस केवल टैक्सपेयर्स तक सीमित नहीं है बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वास्तव में भारत दुनिया के सबसे अधिक टैक्स वसूलने वाले देशों में शामिल है? आंकड़ों की पड़ताल करने पर तस्वीर उतनी सीधी नहीं दिखती जितनी आम धारणा है।
व्यक्तिगत आयकर के मामले में भारत कहां खड़ा है?
भारत में नई कर व्यवस्था के तहत उच्च आय वर्ग के लिए अधिभार और उपकर जोड़ने के बाद प्रभावी अधिकतम आयकर दर लगभग 39% तक पहुंच जाती है। कुछ मामलों में पुरानी व्यवस्था के तहत यह इससे भी अधिक हो सकती है। अगर तुलना विकसित देशों से करें तो जर्मनी और ब्रिटेन में शीर्ष व्यक्तिगत आयकर दर लगभग 45% है, जबकि अमेरिका और चीन में भी उच्च आय वर्ग पर भारी कर लगाया जाता है। हालांकि तस्वीर बदल जाती है जब तुलना एशिया के प्रतिस्पर्धी देशों से होती है। सिंगापुर में अधिकतम व्यक्तिगत आयकर दर केवल 24% है, जबकि वियतनाम और इंडोनेशिया में यह लगभग 35% है। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि वैश्विक प्रतिभाओं और उद्यमियों को आकर्षित करने के मामले में भारत की कर व्यवस्था अभी भी प्रतिस्पर्धी बढ़त नहीं बना पाई है।
केवल टैक्स दर नहीं, पूरी व्यवस्था भी मायने रखती है
विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशक और पेशेवर केवल कर की दर नहीं देखते बल्कि पूरी कर व्यवस्था का मूल्यांकन करते हैं। यदि नियम बार-बार बदलें, अनुपालन प्रक्रिया जटिल हो या कर विवाद लंबे समय तक चलते रहें, तो निवेशकों का भरोसा प्रभावित होता है। यही वजह है कि स्पष्ट और स्थिर कर नीति आज वैश्विक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। भारत ने मध्यम आय वर्ग को राहत देने के लिए नई कर व्यवस्था में बदलाव किए हैं, लेकिन उच्च आय वर्ग के लिए लागू अधिभार की सीमाएं कई वर्षों से अपरिवर्तित हैं। महंगाई और वेतन वृद्धि के कारण अब पहले की तुलना में अधिक लोग ऊंचे टैक्स स्लैब में पहुंच रहे हैं।
कॉरपोरेट टैक्स में भारत ने बदली अपनी तस्वीर
जहां व्यक्तिगत आयकर चर्चा का विषय बना हुआ है, वहीं कॉरपोरेट टैक्स के मोर्चे पर भारत ने पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय सुधार किए हैं। 2019 में सरकार ने कंपनियों के लिए कर दर घटाकर 22% कर दी थी। नई विनिर्माण इकाइयों के लिए यह प्रभावी दर लगभग 17% तक लाई गई, जिसने भारत को वैश्विक विनिर्माण निवेश के लिए अधिक आकर्षक बनाया। आज भारत का सामान्य कॉरपोरेट टैक्स लगभग 25% है। यह इंडोनेशिया के करीब है, जबकि सिंगापुर (17%) और वियतनाम (20%) अभी भी कुछ हद तक अधिक प्रतिस्पर्धी हैं। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में वैश्विक कंपनियों के निवेश, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना और "मेक इन इंडिया" अभियान को नई गति मिली है।
GST ने व्यवस्था आसान की, लेकिन बहस खत्म नहीं हुई
वस्तु एवं सेवा कर लागू होने के बाद देश में अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक एकीकृत हुई। हाल के वर्षों में सरकार ने टैक्स स्लैब में भी बदलाव किए और कई आवश्यक वस्तुओं पर कर का बोझ कम किया। इसके बावजूद आम उपभोक्ता को राहत कितनी मिली है, इसका जवाब अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। कई कर विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत का बहु-दर वाला GST ढांचा अभी भी अपेक्षाकृत जटिल है। पेट्रोलियम उत्पादों और कुछ अन्य क्षेत्रों को GST के दायरे से बाहर रखने के कारण कर व्यवस्था पूरी तरह सरल नहीं बन पाई है। यहीं से कहानी दिलचस्प हो जाती है। भारत में प्रत्यक्ष कर (आयकर) देने वालों की संख्या सीमित है, जबकि अप्रत्यक्ष कर लगभग हर व्यक्ति देता है। यही कारण है कि कम आय वाले परिवार भी अपनी आय का बड़ा हिस्सा GST के रूप में खर्च कर देते हैं।
असली चुनौती टैक्स दर नहीं, टैक्स देने वालों की संख्या है
अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत की सबसे बड़ी चुनौती ऊंची टैक्स दर नहीं बल्कि सीमित टैक्स आधार है। बैंक ऑफ बड़ौदा की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत का कुल टैक्स-टू-जीडीपी अनुपात 19.6% है। यह हांगकांग, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे कई उभरते देशों से बेहतर है, लेकिन जर्मनी (करीब 38%) और अमेरिका (25.6%) से काफी कम है। इसका मतलब है कि सरकार को अपनी अर्थव्यवस्था के आकार के मुकाबले अपेक्षाकृत कम कर प्राप्त होता है। परिणामस्वरूप टैक्स का बड़ा हिस्सा संगठित क्षेत्र के वेतनभोगी कर्मचारियों और औपचारिक कारोबारों से आता है।
क्यों बढ़ रही है वेतनभोगी कर्मचारियों की नाराजगी?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सैलरी पाने वाले लोग खुद को सबसे ज्यादा दबाव में क्यों महसूस करते हैं? इसका जवाब प्रत्यक्ष कर संग्रह के आंकड़ों में छिपा है। हाल के वर्षों में पहली बार व्यक्तिगत आयकर से सरकार की आय, कॉरपोरेट टैक्स से अधिक हो गई है। पिछले एक दशक में प्रत्यक्ष करों में व्यक्तिगत आयकर की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है जबकि कॉरपोरेट टैक्स का योगदान घटा है। यानी टैक्स का बोझ धीरे-धीरे वेतनभोगी और संगठित वर्ग की ओर स्थानांतरित हुआ है। यही वर्ग आयकर भी देता है और रोजमर्रा के खर्चों पर GST भी चुकाता है। यही दोहरा दबाव "ओवरटैक्स्ड" होने की भावना को मजबूत करता है।
आगे सरकार के सामने क्या चुनौती है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती टैक्स दर बढ़ाना नहीं बल्कि टैक्स आधार का विस्तार करना होगी। यदि अधिक लोग औपचारिक अर्थव्यवस्था में शामिल होंगे, डिजिटल भुगतान और अनुपालन बेहतर होगा तथा कर प्रशासन अधिक पारदर्शी बनेगा, तो समान राजस्व कम दरों पर भी जुटाया जा सकता है। दूसरी ओर, यदि टैक्स का भार सीमित वर्ग पर ही केंद्रित रहा, तो उपभोग, बचत और निवेश तीनों पर दबाव बढ़ सकता है।
निष्कर्ष
भारत की कर व्यवस्था को केवल ऊंची या कम दरों के आधार पर नहीं आंका जा सकता। व्यक्तिगत आयकर के मामले में भारत कई एशियाई देशों की तुलना में महंगा दिखाई देता है, जबकि कॉरपोरेट टैक्स सुधारों ने देश की वैश्विक प्रतिस्पर्धा मजबूत की है। असली चुनौती यह है कि प्रत्यक्ष कर का दायरा अभी भी सीमित है और उसका बड़ा हिस्सा वेतनभोगी वर्ग वहन कर रहा है। आने वाले वर्षों में सरकार यदि टैक्स आधार बढ़ाने, अनुपालन आसान बनाने और कर व्यवस्था को अधिक स्थिर एवं सरल बनाने में सफल रहती है, तो टैक्सपेयर्स पर दबाव कम हो सकता है। फिलहाल निवेशकों और आम नागरिकों दोनों की नजर आगामी बजट, आयकर सुधारों और GST के अगले चरण पर बनी रहेगी, क्योंकि यही फैसले भारत की कर व्यवस्था की दिशा तय करेंगे।