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भारत में जल्द ही आपकी जेब में कागज के बजाय प्लास्टिक के नोट दिखाई दे सकते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक एक दशक पुराने प्रस्ताव को फिर से सक्रिय कर रहा है और प्लास्टिक आधारित मुद्रा नोटों को चलन में लाने की तैयारी कर रहा है। इस दिशा में एक परीक्षण परियोजना की घोषणा भी जल्द हो सकती है। यह फैसला ऐसे समय में सामने आया है जब डिजिटल भुगतान लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन नकदी की मांग भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। साथ ही, नोट छापने की लागत तेजी से बढ़ रही है और हर साल करोड़ों खराब नोटों को चलन से बाहर करना पड़ रहा है। यही वजह है कि केंद्रीय बैंक अब ऐसे विकल्प की तलाश में है जो अधिक टिकाऊ हो, कम खर्चीला हो और लंबे समय तक उपयोग में रह सके।
आखिर प्लास्टिक नोट क्या होते हैं?
प्लास्टिक नोट, जिन्हें तकनीकी भाषा में पॉलिमर नोट कहा जाता है, सामान्य कागजी नोटों की तरह दिखते और इस्तेमाल होते हैं, लेकिन इन्हें विशेष प्रकार की पतली और लचीली प्लास्टिक सामग्री से बनाया जाता है। ये नोट पानी, धूल, नमी और फटने से काफी हद तक सुरक्षित रहते हैं। सामान्य कागजी नोटों की तुलना में इनकी उम्र कई गुना अधिक होती है। दुनिया के कई देशों ने पहले ही ऐसे नोटों को अपनाया है और उन्हें बेहतर परिणाम मिले हैं। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, सिंगापुर, न्यूजीलैंड और ब्रिटेन जैसे देश लंबे समय से पॉलिमर नोटों का उपयोग कर रहे हैं।
आरबीआई अब इस योजना पर फिर से क्यों विचार कर रहा है?
इसके पीछे सबसे बड़ा कारण बढ़ती लागत है। आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में मुद्रा छपाई पर 6,372.8 करोड़ रुपये खर्च हुए। एक साल पहले यह खर्च 5,101.4 करोड़ रुपये था। यानी सिर्फ एक साल में मुद्रा छपाई का खर्च लगभग 25 प्रतिशत बढ़ गया। इसके अलावा हर साल बड़ी संख्या में खराब और फटे हुए नोटों को चलन से हटाना पड़ता है। वित्त वर्ष 2024-25 में लगभग 23.8 अरब खराब नोटों को नष्ट किया गया। यह पिछले वर्ष की तुलना में 12.3 प्रतिशत अधिक था। सबसे ज्यादा खराब होने वाले नोट 500 रुपये और 100 रुपये के रहे। स्पष्ट है कि नोटों की छपाई और उनके रखरखाव पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अधिक टिकाऊ नोट केंद्रीय बैंक के लिए बेहतर विकल्प बन सकते हैं।
डिजिटल भुगतान बढ़े, फिर भी नकदी की मांग क्यों बढ़ रही है?
पिछले कुछ वर्षों में देश में डिजिटल भुगतान ने तेज रफ्तार पकड़ी है। फिर भी नकदी की मांग कम नहीं हुई है। 15 मई तक देश में चलन में मौजूद कुल मुद्रा 42.86 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। यह पिछले वर्ष की तुलना में 11.5 प्रतिशत अधिक है। दिलचस्प बात यह है कि वित्त वर्ष 2026-27 के शुरुआती डेढ़ महीने में ही चलन में मौजूद नकदी 1.15 लाख करोड़ रुपये बढ़ गई। यह दर्शाता है कि ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे कारोबारों और दैनिक लेनदेन में नकदी की भूमिका अभी भी बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए आरबीआई को लगातार बड़ी मात्रा में नए नोट छापने पड़ रहे हैं।
छोटे नोट बने सबसे बड़ी चुनौती
10 रुपये और 20 रुपये जैसे छोटे मूल्य वाले नोट सबसे अधिक उपयोग में आते हैं। यही कारण है कि ये सबसे जल्दी खराब भी हो जाते हैं। हालांकि इन नोटों की संख्या बड़ी है, लेकिन कुल मुद्रा मूल्य में इनकी हिस्सेदारी बहुत कम है। 10 रुपये के नोट की हिस्सेदारी केवल 0.7 प्रतिशत और 20 रुपये के नोट की हिस्सेदारी लगभग 0.8 प्रतिशत है। आरबीआई ने छोटे नोटों की जगह सिक्कों के उपयोग को बढ़ावा देने की कोशिश की थी। वित्त वर्ष 2025 में 1.5 अरब सिक्के बाजार में भेजे गए, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली। ऐसे में संभावना है कि पॉलिमर नोटों की शुरुआत सबसे पहले 10 और 20 रुपये के नोटों से की जाए।
एक दशक पहले क्यों रुक गई थी यह योजना?
भारत ने पहली बार 2012 में प्लास्टिक नोटों का परीक्षण करने की योजना बनाई थी। उस समय 10 रुपये के लगभग 100 करोड़ पॉलिमर नोट पांच शहरों में परीक्षण के लिए जारी करने का फैसला लिया गया था। इनमें जयपुर, कोच्चि, मैसूर, भुवनेश्वर और शिमला शामिल थे। लेकिन तकनीकी समस्याओं के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। उस समय कई एटीएम मशीनें ऐसे नोटों को पहचान नहीं पा रही थीं। अब स्थिति बदल चुकी है। बैंकिंग तकनीक और मुद्रा पहचान प्रणाली काफी विकसित हो चुकी है। सूत्रों के अनुसार एटीएम और नकदी प्रबंधन प्रणाली को पॉलिमर नोटों के अनुरूप तैयार किया जा सकता है।
निवेशकों और अर्थव्यवस्था के लिए इसका क्या मतलब है?
पॉलिमर नोटों का सबसे बड़ा फायदा लागत बचत के रूप में सामने आ सकता है। हालांकि शुरुआत में नई तकनीक और उत्पादन व्यवस्था पर निवेश करना पड़ेगा, लेकिन लंबे समय में नोटों को बार-बार बदलने की जरूरत कम होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि एक पॉलिमर नोट की उम्र सामान्य कागजी नोट की तुलना में लगभग ढाई गुना तक अधिक हो सकती है। इससे मुद्रा छपाई का खर्च कम होगा, नकदी प्रबंधन अधिक कुशल बनेगा और केंद्रीय बैंक पर वित्तीय दबाव भी घटेगा। इसके अलावा इन नोटों में बेहतर सुरक्षा सुविधाएं जोड़ी जा सकती हैं, जिससे नकली नोटों की समस्या पर भी नियंत्रण पाने में मदद मिल सकती है।
दुनिया से क्या सीख सकता है भारत?
ऑस्ट्रेलिया ने 1988 में सबसे पहले पॉलिमर नोट शुरू किए थे। आज 60 से अधिक देशों में इनका उपयोग हो रहा है। कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया, रोमानिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों ने बताया है कि पॉलिमर नोटों से नोट बदलने की लागत कम हुई और नोट लंबे समय तक चलन में बने रहे। भारत जैसे बड़े और विविधतापूर्ण देश के लिए यह प्रयोग और भी महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि यहां प्रतिदिन करोड़ों लोग नकदी का उपयोग करते हैं।
निष्कर्ष:
प्लास्टिक नोटों को लेकर आरबीआई की नई पहल केवल मुद्रा बदलने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह नकदी प्रबंधन को अधिक आधुनिक, टिकाऊ और किफायती बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है। बढ़ती छपाई लागत, रिकॉर्ड स्तर की नकदी मांग और हर साल अरबों खराब नोटों की समस्या ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पारंपरिक व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। यदि परीक्षण परियोजना सफल रहती है, तो आने वाले वर्षों में भारतीय मुद्रा का स्वरूप बदल सकता है। निवेशकों और वित्तीय क्षेत्र के लिए यह संकेत है कि देश की मुद्रा व्यवस्था भी तकनीकी बदलाव के नए दौर में प्रवेश कर रही है। हो सकता है कि आने वाले समय में आपके हाथ में आने वाला 10 या 20 रुपये का नोट कागज का नहीं, बल्कि प्लास्टिक का हो। और यही बदलाव भारतीय मुद्रा प्रणाली के अगले बड़े अध्याय की शुरुआत साबित हो सकता है।