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भारत की बैंकिंग व्यवस्था और कारोबारी दुनिया में पिछले दस वर्षों का सबसे बड़ा बदलाव अगर किसी एक कानून ने किया है, तो वह है दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी)। वर्ष 2016 में लागू हुए इस कानून ने फंसे हुए कर्ज की वसूली का तरीका पूरी तरह बदल दिया। जहां पहले कंपनियों के दिवालिया मामलों में वर्षों लग जाते थे, वहीं अब समयबद्ध समाधान की व्यवस्था ने बैंकों, निवेशकों और कारोबार जगत को नई उम्मीद दी है। आईबीसी के दस साल पूरे होने पर सामने आए आंकड़े बताते हैं कि इस कानून ने केवल बैंकों की वसूली नहीं बढ़ाई, बल्कि पूरे वित्तीय तंत्र में अनुशासन और भरोसा भी मजबूत किया है। मार्च 2026 तक बैंकों और अन्य ऋणदाताओं को 4.32 लाख करोड़ रुपये से अधिक की वसूली हुई है। वहीं 14 लाख करोड़ रुपये के दावों वाले 30,000 से ज्यादा मामले अदालत में औपचारिक सुनवाई शुरू होने से पहले ही सुलझ गए।
क्यों जरूरी था ऐसा कानून?
आईबीसी से पहले भारत में दिवालिया कंपनियों के मामलों का निपटारा कई अलग-अलग कानूनों और संस्थाओं के जरिए होता था। इससे प्रक्रियाएं लंबी खिंच जाती थीं और कई बार कंपनियों की संपत्ति का मूल्य भी घट जाता था। इसका सीधा नुकसान बैंकों और निवेशकों को उठाना पड़ता था। कर्ज की वसूली मुश्किल हो जाती थी और कई कंपनियां दोबारा खड़ी होने का मौका खो देती थीं। इन्हीं समस्याओं को दूर करने के लिए सरकार ने 2016 में आईबीसी लागू किया। इसका उद्देश्य था समय पर समाधान, बेहतर वसूली और संकट में फंसी कंपनियों को दोबारा खड़ा करने का अवसर देना।
1,419 मामलों से हुई 4 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की वसूली
भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड के अनुसार मार्च 2026 तक 1,419 मामलों में सफल समाधान योजनाएं लागू की गईं। इन मामलों के जरिए ऋणदाताओं को 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्राप्त हुई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार कुल वसूली लगभग 4.32 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। यह राशि उन कंपनियों की संपत्तियों को सीधे बेचने से मिलने वाली संभावित रकम से भी अधिक रही। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी कंपनी को पूरी तरह बंद करने के बजाय उसे दोबारा चालू करना कई बार ज्यादा फायदेमंद साबित होता है। आईबीसी ने यही साबित किया है।
अदालत के बाहर ही सुलझ गए 30,000 से ज्यादा मामले
आईबीसी की सबसे बड़ी सफलता केवल वसूली नहीं है। इस कानून का असर उन मामलों में भी दिखाई दिया जो अदालत तक पहुंचे ही नहीं। मार्च 2026 तक राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण में दाखिल 30,000 से अधिक मामलों का निपटारा शुरुआती चरण में ही हो गया। इन मामलों की कुल राशि लगभग 14 लाख करोड़ रुपये थी। इसका मतलब है कि कंपनियों और कर्जदाताओं ने लंबी कानूनी लड़ाई के बजाय समझौते का रास्ता चुना। इससे समय और धन दोनों की बचत हुई। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे आईबीसी का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक प्रभाव मानते हैं। अब कंपनियां भुगतान टालने के बजाय जल्दी समाधान तलाशने लगी हैं।
कितनी कंपनियां बचीं और कितनी बंद हुईं?
मार्च 2026 तक आईबीसी के तहत कुल 8,987 मामले स्वीकार किए गए थे। इनमें से 7,102 मामलों का निपटारा हो चुका है। इनमें 4,099 कंपनियां बचाई जा सकीं, जो कुल समाप्त मामलों का लगभग 58 प्रतिशत हिस्सा हैं। दूसरी ओर 3,003 मामलों में परिसमापन की प्रक्रिया अपनाई गई। एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि समाधान प्राप्त करने वाली लगभग 42 प्रतिशत कंपनियां पहले से बंद थीं या गंभीर संकट में थीं। इसके बावजूद उन्हें दोबारा कारोबार शुरू करने का मौका मिला। यह दिखाता है कि आईबीसी केवल कर्ज वसूली का माध्यम नहीं बल्कि रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को बचाने का भी साधन है।
बैंकिंग क्षेत्र को मिला सबसे बड़ा फायदा
भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में बैंकों ने विभिन्न माध्यमों से कुल 1,04,099 करोड़ रुपये की वसूली की थी। इसमें अकेले आईबीसी के जरिए 54,528 करोड़ रुपये की वसूली हुई, जो कुल वसूली का 52.4 प्रतिशत हिस्सा था। यह अन्य सभी प्रमुख वसूली माध्यमों से अधिक रहा। इसका सीधा फायदा यह हुआ कि बैंकों की वित्तीय स्थिति मजबूत हुई और वे नए कर्ज देने में अधिक सक्षम बने। मजबूत बैंकिंग व्यवस्था किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इससे निवेश और विकास दोनों को गति मिलती है।
आईआईएम के अध्ययन ने दिखाई सकारात्मक तस्वीर
आईआईएम अहमदाबाद और आईआईएम बेंगलुरु के अध्ययनों ने भी आईबीसी के प्रभाव को मजबूत साबित किया है। अध्ययन के अनुसार समाधान प्राप्त कंपनियों की बिक्री में 76 प्रतिशत वृद्धि हुई। कर्मचारी खर्च 50 प्रतिशत बढ़ा, जो रोजगार बढ़ने का संकेत है। इन कंपनियों की कुल संपत्ति में 50 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई और पूंजी निवेश में 130 प्रतिशत का उछाल आया। सूचीबद्ध कंपनियों का बाजार मूल्य 2 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 6 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। वहीं नकदी की स्थिति में 80 प्रतिशत सुधार देखने को मिला। यह दर्शाता है कि सही समाधान मिलने पर संकटग्रस्त कंपनियां दोबारा मजबूत बन सकती हैं।
आगे की राह और नई चुनौतियां
हालांकि आईबीसी ने शानदार परिणाम दिए हैं, लेकिन कुछ चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। कई मामलों में समाधान की प्रक्रिया तय समय से अधिक लंबी चली है। कानूनी विवाद और अपीलों के कारण कुछ मामलों में देरी हुई, जिससे संपत्तियों का मूल्य प्रभावित हुआ। इसी को देखते हुए सरकार ने 2026 में नए संशोधन किए हैं। इनका उद्देश्य प्रक्रिया को और तेज, पारदर्शी और प्रभावी बनाना है। यदि ये सुधार सफल रहते हैं, तो आने वाले वर्षों में वसूली और समाधान दोनों में और बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
निष्कर्ष:
दस वर्षों में आईबीसी ने यह साबित कर दिया है कि मजबूत कानून केवल कागजों पर नहीं, बल्कि पूरे आर्थिक तंत्र को बदल सकते हैं। 4.32 लाख करोड़ रुपये की वसूली, 14 लाख करोड़ रुपये के मामलों का अदालत से बाहर समाधान और हजारों कंपनियों का पुनर्जीवन इसकी सबसे बड़ी उपलब्धियां हैं। निवेशकों के लिए यह संदेश बेहद स्पष्ट है। भारत की वित्तीय व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक अनुशासित, पारदर्शी और भरोसेमंद बन रही है। मजबूत बैंक, बेहतर कर्ज संस्कृति और समयबद्ध समाधान की व्यवस्था देश की आर्थिक नींव को और मजबूत कर रही है। आईबीसी की असली सफलता केवल वसूली के आंकड़ों में नहीं, बल्कि उस भरोसे में छिपी है जो इसने निवेशकों, बैंकों और कारोबार जगत को दिया है। यही भरोसा आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक प्रगति का एक मजबूत आधार बन सकता है।