UPI पर फिर लौट सकती है MDR फीस! ₹2,000 से ऊपर के भुगतान पर सरकार क्यों कर रही है विचार 

इसका किस पर पड़ेगा असर?

भारत में डिजिटल भुगतान की पहचान बन चुकी यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) एक बार फिर बड़े नीतिगत बदलाव के दौर से गुजर सकता है। केंद्र सरकार बड़े कारोबारियों द्वारा किए जाने वाले ₹2,000 से अधिक के UPI भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। चर्चा है कि यह शुल्क 0.5% से कम हो सकता है और इसका बोझ ग्राहकों पर नहीं बल्कि केवल बड़े व्यापारियों पर डाला जाएगा। यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले छह वर्षों से UPI पूरी तरह शून्य MDR मॉडल पर काम कर रहा है। इसी मॉडल ने भारत में डिजिटल भुगतान को अभूतपूर्व गति दी। लेकिन अब सरकार और उद्योग के सामने एक नई चुनौती खड़ी है क्या इतनी तेजी से बढ़ते डिजिटल भुगतान नेटवर्क को बिना किसी राजस्व मॉडल के लंबे समय तक चलाया जा सकता है? यही वजह है कि निवेशकों, बैंकों, फिनटेक कंपनियों और व्यापारियों की नजर अब सरकार के अंतिम फैसले पर टिकी हुई है। यदि प्रस्ताव लागू होता है तो यह भारत के डिजिटल भुगतान मॉडल में सबसे बड़ा बदलाव माना जाएगा।
आखिर MDR क्या है और इसे फिर से लाने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है?
मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) वह शुल्क होता है जो कोई व्यापारी डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के बदले बैंक या भुगतान सेवा प्रदाता को देता है। इसी राशि से लेनदेन की प्रक्रिया, भुगतान प्रणाली का संचालन, साइबर सुरक्षा, तकनीकी रखरखाव और भुगतान निपटान जैसी सेवाओं का खर्च पूरा किया जाता है। जनवरी 2020 में सरकार ने UPI और रुपे डेबिट कार्ड पर MDR समाप्त कर दिया था ताकि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा मिले। इसका असर भी दिखाई दिया और देश में करोड़ों नए व्यापारी तथा उपभोक्ता डिजिटल भुगतान से जुड़ गए। लेकिन सवाल यह है कि जब हर लेनदेन मुफ्त होगा तो इस पूरे नेटवर्क का खर्च कौन उठाएगा? यही वह मुद्दा है जिस पर अब सरकार दोबारा विचार कर रही है।
सरकार के प्रस्ताव में क्या है? 
सूत्रों के अनुसार सरकार जिस मॉडल पर विचार कर रही है, उसमें केवल
बड़े व्यापारियों पर MDR लगाया जाएगा। प्रस्ताव के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं -

  • ₹2,000 से अधिक के UPI भुगतान पर MDR लागू हो सकता है।
  • शुल्क की दर 0.5% से कम रहने की संभावना है।
  • उपभोक्ताओं से कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा।
  • लगभग ₹1 करोड़ से ₹1.5 करोड़ से अधिक वार्षिक कारोबार वाले व्यापारी ही इसके दायरे में आ सकते हैं।
  • छोटे दुकानदारों और सूक्ष्म कारोबारियों को इससे बाहर रखा जा सकता है।
सरकार का उद्देश्य डिजिटल भुगतान को महंगा बनाना नहीं बल्कि भुगतान प्रणाली को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना बताया जा रहा है।
छोटे व्यापारियों और ग्राहकों पर क्या असर पड़ेगा?
इस प्रस्ताव का सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि छोटे व्यापारियों को राहत देने की कोशिश की गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 90% व्यापारी छोटे कारोबार की श्रेणी में आते हैं। यदि प्रस्ताव मौजूदा स्वरूप में लागू होता है तो इन पर MDR नहीं लगेगा। उधर ग्राहकों के लिए भी फिलहाल कोई अतिरिक्त शुल्क प्रस्तावित नहीं है। यानी कोई व्यक्ति UPI से भुगतान करेगा तो उससे अलग से MDR नहीं लिया जाएगा। शुल्क केवल व्यापारी स्तर पर लागू होने की संभावना है। हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। कुछ बड़े व्यापारी भविष्य में इस अतिरिक्त लागत को उत्पादों या सेवाओं की कीमतों में शामिल करने की कोशिश कर सकते हैं। आखिर सरकार को अब यह कदम क्यों उठाना पड़ रहा है?
UPI की सफलता जितनी बड़ी रही है, उसके संचालन की लागत भी उतनी ही तेजी से बढ़ी है। संसदीय वित्त समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि शून्य MDR मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं माना जा सकता। भुगतान नेटवर्क के विस्तार, साइबर सुरक्षा, सर्वर क्षमता और नई तकनीकों में लगातार निवेश की जरूरत पड़ती है। सरकार फिलहाल ₹2,000 तक के छोटे UPI भुगतान पर बैंकों और भुगतान कंपनियों को प्रोत्साहन राशि देती है। लेकिन उद्योग का कहना है कि यह सहायता वास्तविक लागत का केवल छोटा हिस्सा ही पूरा कर पाती है। यही वजह है कि बैंक और भुगतान सेवा प्रदाता लंबे समय से किसी न किसी राजस्व मॉडल की मांग कर रहे हैं।
UPI की रफ्तार कितनी तेज है?
आज UPI भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है। वित्त वर्ष 2017 में जहां केवल 2 करोड़ UPI लेनदेन हुए थे, वहीं वित्त वर्ष 2026 तक यह संख्या बढ़कर 241 अरब से अधिक पहुंच गई। इसी अवधि में लेनदेन का कुल मूल्य 7,000 करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 314 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। दिलचस्प बात यह है कि व्यक्ति से व्यापारी (P2M) होने वाले लगभग 86% भुगतान 500 रुपये से कम के होते हैं। करीब 10% भुगतान 501 से 2,000 रुपये के बीच रहते हैं, जबकि केवल 4% लेनदेन ही 2,000 रुपये से अधिक के होते हैं। यानी प्रस्तावित MDR बहुत सीमित हिस्से के लेनदेन को प्रभावित करेगा।
विशेषज्ञ क्या मानते हैं?
भुगतान उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बैंक और फिनटेक कंपनियों को पर्याप्त आर्थिक सहायता नहीं मिलेगी तो भविष्य में डिजिटल भुगतान नेटवर्क का विस्तार प्रभावित हो सकता है। दूसरी ओर, व्यापारिक संगठनों का मानना है कि यदि MDR बहुत अधिक रखा गया तो बड़े व्यापारी इसे ग्राहकों पर स्थानांतरित करने की कोशिश कर सकते हैं। यही कारण है कि सरकार बेहद संतुलित मॉडल तैयार करने की कोशिश कर रही है, जिसमें डिजिटल भुगतान की गति भी बनी रहे और उद्योग की आर्थिक जरूरतें भी पूरी हो सकें।
अब आगे क्या होगा?
सूत्रों के अनुसार सरकार अगले कुछ सप्ताह में इस प्रस्ताव पर अंतिम फैसला ले सकती है। यदि MDR लागू होता है तो भुगतान सेवा प्रदाताओं, बैंकों और फिनटेक कंपनियों की आय में सुधार हो सकता है। दूसरी ओर, बड़े संगठित व्यापारियों को अपने भुगतान खर्च का नया आकलन करना होगा। यही वजह है कि निवेशकों की नजर अब इस फैसले पर बनी हुई है क्योंकि इसका असर डिजिटल भुगतान उद्योग की लाभप्रदता और भविष्य के निवेश पर पड़ सकता है।
निष्कर्ष
UPI ने भारत में डिजिटल भुगतान की तस्वीर पूरी तरह बदल दी है और आज यह दुनिया की सबसे सफल रियल-टाइम भुगतान प्रणालियों में गिना जाता है। लेकिन इतनी तेज वृद्धि के साथ इसके संचालन और तकनीकी ढांचे की लागत भी लगातार बढ़ रही है। सरकार का प्रस्ताव इसी चुनौती का समाधान खोजने की कोशिश है। यदि MDR केवल बड़े व्यापारियों और उच्च मूल्य के लेनदेन तक सीमित रहता है तो आम उपभोक्ता और छोटे व्यापारी काफी हद तक सुरक्षित रहेंगे। निवेशकों के लिए सबसे बड़ा अवसर डिजिटल भुगतान उद्योग की वित्तीय मजबूती में छिपा है, जबकि सबसे बड़ा जोखिम यह रहेगा कि कहीं अतिरिक्त लागत व्यापारियों के जरिए ग्राहकों तक न पहुंच जाए। अब सरकार के अंतिम निर्णय पर पूरे डिजिटल भुगतान उद्योग की नजर टिकी हुई है।