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भारतीय शेयर बाजार में निवेश करने वालों के लिए आने वाले महीनों में ट्रेडिंग का तरीका बदल सकता है। बाजार नियामक SEBI स्टॉक लेंडिंग एंड बॉरोइंग (शेयर उधार लेने और देने की व्यवस्था) से जुड़े नियमों में बड़े बदलाव पर विचार कर रहा है। यदि ये प्रस्ताव लागू होते हैं, तो Short Selling यानी शेयरों में गिरावट का अनुमान लगाकर कारोबार करना पहले की तुलना में अधिक आसान हो सकता है। यह बदलाव केवल सक्रिय ट्रेडर्स तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर बाजार की तरलता (Liquidity), कैश मार्केट की गतिविधियों, विदेशी निवेशकों की रुचि और लंबी अवधि के निवेशकों तक भी पहुंच सकता है। यही वजह है कि बाजार के विशेषज्ञ इस प्रस्ताव को भारतीय पूंजी बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार मान रहे हैं। शेयर बाजार ने फिलहाल इस प्रस्ताव पर कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं दी है क्योंकि अभी यह विचार-विमर्श के चरण में है। लेकिन यदि नियमों में ढील मिलती है, तो बाजार में कारोबार का दायरा बढ़ सकता है और निवेशकों के पास अधिक विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं। हालांकि, तस्वीर का दूसरा पहलू भी है शॉर्ट सेलिंग जितनी अवसर देती है, उतना ही बड़ा जोखिम भी अपने साथ लेकर आती है।
आखिर पूरा मामला क्या है?
रिपोर्टों के अनुसार, SEBI स्टॉक लेंडिंग एंड बॉरोइंग (SLB) व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने पर काम कर रहा है। इसके तहत उन शेयरों की संख्या लगभग दोगुनी की जा सकती है जिन्हें उधार लेकर बेचना संभव होगा। साथ ही, शेयर उधार लेने के लिए रखी जाने वाली सुरक्षा राशि यानी कोलैटरल (जमानत के रूप में जमा धन या प्रतिभूतियां) की आवश्यकता भी कम की जा सकती है। यदि ऐसा होता है, तो भारतीय बाजार में पिछले कई वर्षों का यह सबसे बड़ा संरचनात्मक सुधार माना जा सकता है।
पहले समझिए, Short Selling क्या होती है?
सामान्य निवेश में निवेशक पहले शेयर खरीदता है और कीमत बढ़ने पर बेचकर लाभ कमाने की कोशिश करता है। लेकिन शॉर्ट सेलिंग इसका ठीक उल्टा तरीका है। इसमें निवेशक पहले किसी दूसरे निवेशक से शेयर उधार लेता है और उसे मौजूदा बाजार भाव पर बेच देता है। यदि बाद में शेयर की कीमत गिर जाती है, तो वह वही शेयर कम कीमत पर खरीदकर वापस लौटा देता है। दोनों कीमतों के बीच का अंतर उसका लाभ बन जाता है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी शेयर का भाव 500 रुपये है और निवेशक को लगता है कि यह 450 रुपये तक गिर सकता है, तो वह शेयर उधार लेकर 500 रुपये में बेच सकता है। बाद में 450 रुपये पर खरीदकर वापस कर देगा और प्रति शेयर 50 रुपये का लाभ होगा। लेकिन यदि शेयर 550 रुपये तक पहुंच गया, तो नुकसान उठाना पड़ेगा। यानी इसमें संभावित नुकसान की कोई निश्चित सीमा नहीं होती।
Stock Lending and Borrowing System की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
यहीं से मामला दिलचस्प हो जाता है। शॉर्ट सेलिंग तभी संभव है जब किसी निवेशक को शेयर उधार मिल सके। यही काम स्टॉक लेंडिंग एंड बॉरोइंग सिस्टम (SLB) करता है। इस व्यवस्था में कुछ निवेशक अपने शेयर सीमित अवधि के लिए उधार देते हैं, जबकि दूसरे निवेशक उन्हें लेकर ट्रेडिंग करते हैं। इससे बाजार में वास्तविक शेयरों के आधार पर कारोबार संभव होता है और कैश मार्केट की सक्रियता बढ़ती है।
SEBI किन नियमों में बदलाव चाहता है?
वर्तमान में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर लगभग 2,600 सूचीबद्ध कंपनियां हैं, लेकिन इनमें से केवल करीब 176 शेयर ही स्टॉक लेंडिंग सिस्टम के दायरे में आते हैं। SEBI अब इस दायरे को व्यापक बनाना चाहता है ताकि अधिक कंपनियों के शेयर इस सुविधा में शामिल हो सकें। इसके अलावा पात्रता से जुड़े कुछ मानकों में भी बदलाव पर विचार किया जा रहा है। फिलहाल किसी शेयर को इस व्यवस्था में शामिल होने के लिए पिछले छह महीनों में प्रत्येक महीने औसतन कम से कम 100 करोड़ रुपये का कारोबार और डेरिवेटिव्स बाजार में पर्याप्त गतिविधि होना आवश्यक है। माना जा रहा है कि इन शर्तों को कुछ हद तक आसान बनाया जा सकता है। Collateral कम होने से क्या बदलेगा?
जब कोई निवेशक शेयर उधार लेता है, तो उसे सुरक्षा के रूप में अतिरिक्त धन या प्रतिभूतियां जमा करनी पड़ती हैं। इसे कोलैटरल कहा जाता है। भारत में कई मामलों में यह आवश्यकता उधार लिए गए शेयरों के मूल्य का लगभग 130 प्रतिशत तक होती है। यानी 100 रुपये मूल्य के शेयर लेने के लिए 130 रुपये की सुरक्षा रखनी पड़ सकती है। इसके विपरीत अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित बाजारों में यह अनुपात लगभग 100 प्रतिशत के आसपास रहता है। यदि भारत में भी कोलैटरल की शर्तें आसान होती हैं, तो बाजार सहभागियों के लिए पूंजी का उपयोग अधिक प्रभावी हो सकता है।
SEBI ऐसा क्यों करना चाहता है?
असल वजह भारतीय शेयर बाजार का तेजी से बदलता स्वरूप है। पिछले एक दशक में भारतीय पूंजी बाजार का आकार उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। NSE पर सूचीबद्ध कंपनियों का संयुक्त बाजार पूंजीकरण 5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो चुका है। दूसरी ओर, डेरिवेटिव्स बाजार की वृद्धि इससे भी तेज रही है। आज डेरिवेटिव्स कारोबार का आकार कैश मार्केट की तुलना में कई गुना बड़ा हो चुका है। यही वजह है कि नियामक कैश मार्केट को अधिक सक्रिय और आकर्षक बनाना चाहता है। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या इससे जोखिम भी बढ़ेंगे? जोखिम और अवसर दोनों मौजूद हैं
SEBI पहले भी कई बार बता चुका है कि लगभग 90 प्रतिशत खुदरा निवेशकों को डेरिवेटिव्स कारोबार में नुकसान होता है। इसकी प्रमुख वजह लीवरेज यानी कम पूंजी से बड़ी पोजीशन लेना है। यदि शॉर्ट सेलिंग अधिक सुलभ होती है, तो पेशेवर निवेशकों और संस्थागत प्रतिभागियों को बेहतर हेजिंग (जोखिम कम करने की रणनीति) के विकल्प मिल सकते हैं। वहीं, नए और अनुभवहीन निवेशकों के लिए यह जोखिम बढ़ाने वाला भी साबित हो सकता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि शॉर्ट सेलिंग को केवल अच्छी समझ और जोखिम प्रबंधन के साथ ही अपनाया जाना चाहिए।
विदेशी निवेशकों की मांग पर क्या फैसला होगा?
विदेशी संस्थागत निवेशक लंबे समय से चाहते रहे हैं कि शेयर उधार लेने और देने की प्रक्रिया सीधे ब्रोकरों के माध्यम से भी संभव हो। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार SEBI फिलहाल इस व्यवस्था को एक्सचेंज आधारित ही रखना चाहता है। नियामक का मानना है कि इससे पारदर्शिता बनी रहती है, जोखिम कम होता है और पूरी बाजार व्यवस्था अधिक सुरक्षित रहती है। अब निवेशकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि अंतिम नियमों में वास्तव में कितनी ढील दी जाती है और उसका व्यवहारिक प्रभाव कितना व्यापक होता है। निष्कर्ष
SEBI का प्रस्ताव केवल शॉर्ट सेलिंग को आसान बनाने का प्रयास नहीं है, बल्कि इसका व्यापक उद्देश्य भारतीय कैश मार्केट को अधिक सक्रिय, गहरा और प्रतिस्पर्धी बनाना है। यदि अधिक शेयर स्टॉक लेंडिंग एंड बॉरोइंग सिस्टम में शामिल होते हैं और कोलैटरल की शर्तें सरल होती हैं, तो बाजार में तरलता बढ़ सकती है और संस्थागत निवेशकों को बेहतर अवसर मिल सकते हैं। हालांकि, खुदरा निवेशकों के लिए सबसे बड़ा जोखिम बिना पर्याप्त जानकारी के शॉर्ट सेलिंग में प्रवेश करना होगा। आने वाले महीनों में SEBI की अंतिम अधिसूचना, पात्र शेयरों की नई सूची, कोलैटरल नियमों में वास्तविक बदलाव और बाजार सहभागियों की प्रतिक्रिया ऐसे प्रमुख संकेत होंगे जिन पर निवेशकों को नजर रखनी चाहिए। जल्दबाजी में रणनीति बदलने के बजाय अंतिम नियमों का इंतजार करना अधिक समझदारी होगी।