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भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से डिजिटल होती जा रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रिक वाहन, दूरसंचार, रक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और आधुनिक विनिर्माण जैसे क्षेत्र अब सेमीकंडक्टर चिप्स पर निर्भर हैं। यही कारण है कि सेमीकंडक्टर को आज की दुनिया का "नया तेल" कहा जाता है। लेकिन एक बड़ी चुनौती यह है कि भारत अपनी चिप जरूरतों का लगभग 90 से 95 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। ऐसे में वैश्विक आपूर्ति शृंखला में किसी भी व्यवधान का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और उद्योगों पर पड़ सकता है। इसी चुनौती को अवसर में बदलने के लिए नीति आयोग ने एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। आयोग का मानना है कि भारत को वर्ष 2035 तक 120 से 150 अरब डॉलर की सेमीकंडक्टर मूल्य शृंखला विकसित करनी चाहिए और वैश्विक चिप उद्योग में केवल भागीदार नहीं बल्कि नेतृत्वकर्ता बनने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
क्यों महत्वपूर्ण है सेमीकंडक्टर उद्योग?
सेमीकंडक्टर वे सूक्ष्म चिप्स हैं जो मोबाइल फोन, कंप्यूटर, सर्वर, कार, रक्षा उपकरण, चिकित्सा मशीनों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों को संचालित करते हैं। आज दुनिया की लगभग हर आधुनिक तकनीक चिप्स पर आधारित है। यही वजह है कि अमेरिका, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप जैसे देश इस क्षेत्र में अरबों डॉलर का निवेश कर रहे हैं। नीति आयोग के अनुसार यदि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है तो तकनीकी आत्मनिर्भरता अनिवार्य होगी और इसकी शुरुआत सेमीकंडक्टर उद्योग से होगी।
2035 तक 150 अरब डॉलर की मूल्य शृंखला का लक्ष्य
नीति आयोग की रिपोर्ट "भारत के सेमीकंडक्टर उद्योग का भविष्य" में कहा गया है कि भारत को 2035 तक 120 से 150 अरब डॉलर की सेमीकंडक्टर मूल्य शृंखला तैयार करने का लक्ष्य रखना चाहिए। यह केवल उत्पादन तक सीमित नहीं होगा। इसमें चिप डिजाइन, निर्माण, उन्नत पैकेजिंग, परीक्षण, सामग्री निर्माण और सहायक बुनियादी ढांचे का विकास भी शामिल होगा। रिपोर्ट के अनुसार यह लक्ष्य भारत को वैश्विक चिप उद्योग में एक महत्वपूर्ण स्थान दिला सकता है और देश को आयात निर्भरता से बाहर निकालने में मदद कर सकता है।
180 अरब डॉलर तक निवेश की होगी जरूरत
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अगले दस वर्षों में लगभग 135 से 180 अरब डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी। रिपोर्ट के मुताबिक आधुनिक चिप निर्माण संयंत्र स्थापित करने में 5 अरब डॉलर से अधिक लागत आती है, जबकि अत्याधुनिक उत्पादन इकाइयों पर 15 अरब डॉलर से अधिक खर्च हो सकता है। इसी कारण नीति आयोग ने सुझाव दिया है कि केंद्र सरकार कुल आवश्यक निवेश का कम से कम एक-तिहाई हिस्सा वहन करे। इससे परियोजनाओं का जोखिम कम होगा और निजी निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी समर्थन मिलने पर बड़े वैश्विक निवेशकों और तकनीकी कंपनियों को भारत में निवेश के लिए आकर्षित करना आसान होगा।
आयात पर बढ़ती निर्भरता बनी बड़ी चिंता
भारत की सबसे बड़ी चुनौती आयात निर्भरता है। वर्तमान में देश की 90 से 95 प्रतिशत चिप मांग आयात के जरिए पूरी होती है। वर्ष 2017 से 2025 के बीच भारत ने लगभग 150 अरब डॉलर मूल्य के सेमीकंडक्टर आयात किए हैं। यदि यही स्थिति जारी रही तो 2035 तक भारत का वार्षिक चिप आयात बिल बढ़कर 240 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। यह केवल आर्थिक बोझ नहीं है बल्कि रणनीतिक जोखिम भी है। वैश्विक तनाव, युद्ध या आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में भारत के कई महत्वपूर्ण उद्योग प्रभावित हो सकते हैं।
किन क्षेत्रों पर रहेगा सबसे ज्यादा फोकस?
नीति आयोग का मानना है कि भारत को उन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना चाहिए जहां वह अपेक्षाकृत तेजी से वैश्विक पहचान बना सकता है। रिपोर्ट में उन्नत पैकेजिंग, आउटसोर्स असेंबली और परीक्षण, चिप डिजाइन, सिस्टम आर्किटेक्चर तथा विशेष प्रकार के सेमीकंडक्टर पदार्थों पर विशेष ध्यान देने की सिफारिश की गई है। भारत पहले से ही वैश्विक चिप डिजाइन कार्यबल का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा रखता है। यही ताकत देश को डिजाइन और नवाचार के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दे सकती है।
2035 तक 200 अरब डॉलर का घरेलू बाजार
भारत में सेमीकंडक्टर की मांग तेजी से बढ़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार देश का सेमीकंडक्टर बाजार 2030 तक लगभग 90 अरब डॉलर और 2035 तक 200 अरब डॉलर से अधिक का हो सकता है। इसके पीछे कई प्रमुख कारण हैं:
• कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सेवाओं का विस्तार
• इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती मांग
• दूरसंचार नेटवर्क का विस्तार
• क्लाउड कंप्यूटिंग का विकास
• रक्षा क्षेत्र का आधुनिकीकरण
• इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में तेजी यानी आने वाले वर्षों में चिप्स की मांग कई गुना बढ़ने वाली है और भारत के पास इस अवसर को भुनाने का बड़ा मौका है।
आत्मनिर्भरता और रोजगार दोनों को मिलेगा बढ़ावा
नीति आयोग का लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं है। रिपोर्ट में 2030 तक 35 से 50 प्रतिशत चिप आत्मनिर्भरता हासिल करने की बात कही गई है। साथ ही 2035 तक देश में उपयोग होने वाली चिप्स से बनने वाले कुल मूल्य का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा भारत के भीतर ही बनाए रखने का लक्ष्य रखा गया है। इससे लाखों उच्च कौशल वाले रोजगार पैदा हो सकते हैं। इंजीनियरिंग, अनुसंधान, डिजाइन, विनिर्माण और तकनीकी सेवाओं में नए अवसर खुलेंगे।
निष्कर्ष:
सेमीकंडक्टर उद्योग अब केवल तकनीकी क्षेत्र का विषय नहीं रह गया है। यह आर्थिक विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक प्रतिस्पर्धा से सीधे जुड़ा हुआ है। नीति आयोग का 120 से 150 अरब डॉलर की सेमीकंडक्टर मूल्य शृंखला का लक्ष्य महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में यह भारत की आवश्यकता भी है। यदि सरकार, उद्योग और निवेशक मिलकर दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाते हैं तो भारत केवल चिप्स का उपभोक्ता नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। आने वाला दशक तय करेगा कि भारत तकनीकी क्रांति का दर्शक बनकर रहता है या उसका नेतृत्व करता है। सेमीकंडक्टर उद्योग में उठाया गया हर कदम इसी भविष्य की दिशा तय करेगा।