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कभी-कभी शेयर बाजार कंपनियों के नतीजों से नहीं, बल्कि दुनिया की राजनीति से हिल जाता है। बुधवार को भारतीय शेयर बाजार में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान को लेकर दिए गए सख्त बयान ने वैश्विक निवेशकों की चिंता बढ़ा दी। नतीजा यह हुआ कि सेंसेक्स और निफ्टी में करीब 2% की तेज गिरावट दर्ज हुई और कुछ ही घंटों में निवेशकों की करीब ₹8 लाख करोड़ की संपत्ति साफ हो गई। यह खबर केवल शेयर बाजार तक सीमित नहीं है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है। ऐसे में यदि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है और कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो इसका असर महंगाई, रुपये, कंपनियों की लागत और आर्थिक विकास पर भी पड़ सकता है। यही वजह है कि निवेशकों के साथ-साथ उद्योग और आम लोगों की नजर भी इस घटनाक्रम पर है। बाजार की प्रतिक्रिया बेहद व्यापक रही। बैंकिंग, एफएमसीजी, तेल एवं गैस, ऑटो और मिडकैप- स्मॉलकैप शेयरों में तेज बिकवाली देखने को मिली। हालांकि तेल उत्पादक कंपनियों और कुछ दवा कंपनियों में अपेक्षाकृत मजबूती रही, क्योंकि निवेशकों ने रक्षात्मक क्षेत्रों की ओर रुख किया।
ट्रंप के बयान ने क्यों बढ़ा निवेशकों का डर?
गिरावट की सबसे बड़ी वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वह बयान रहा, जिसमें उन्होंने ईरान के साथ युद्धविराम की समझ को खत्म बताया। उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा और मौजूदा समझौता अब प्रभावी नहीं रहा। लेकिन सवाल यह है कि इसका भारतीय बाजार से क्या संबंध है? दरअसल, जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है तो सबसे पहले ऊर्जा बाजार प्रभावित होता है। निवेशकों को डर रहता है कि यदि हालात बिगड़ते हैं तो तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है। यही आशंका वैश्विक शेयर बाजारों में बिकवाली का कारण बनी।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल क्यों चिंता बढ़ा रहा है?
तनाव बढ़ने के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 5% चढ़कर 78 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए तेल महंगा होने का सीधा असर देश के आयात बिल, महंगाई और कंपनियों की लागत पर पड़ता है। ऑटोमोबाइल, पेंट, विमानन, टायर और तेल विपणन कंपनियां ऐसे समय सबसे अधिक दबाव में रहती हैं क्योंकि उनका खर्च बढ़ जाता है। यही वजह रही कि इन क्षेत्रों के शेयरों में सबसे ज्यादा बिकवाली देखने को मिली।
वैश्विक बाजारों में कमजोरी ने कैसे बढ़ाया दबाव?
भारतीय बाजार अकेले नहीं गिरे। यूरोप और एशिया के प्रमुख शेयर बाजारों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई। जापान का निक्केई, दक्षिण कोरिया का कोस्पी और यूरोप के प्रमुख सूचकांक लाल निशान में बंद हुए। अमेरिकी वायदा बाजारों में भी कमजोरी दिखाई दी। जब दुनिया भर के निवेशक जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाने लगते हैं, तो विदेशी संस्थागत निवेशक उभरते बाजारों से भी पैसा निकालना शुरू कर देते हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और रुपया क्यों बने चिंता की वजह?
हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की प्रतिफल दर यानी यील्ड में बढ़ोतरी हुई। आसान भाषा में कहें तो निवेशकों को सुरक्षित सरकारी बॉन्ड पर अधिक रिटर्न मिलने लगा। ऐसे माहौल में शेयर बाजार अपेक्षाकृत कम आकर्षक दिखाई देता है। दूसरी ओर भारतीय रुपया भी डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 95.50 के स्तर से नीचे फिसल गया। कमजोर रुपया आयात को महंगा बनाता है और विदेशी निवेशकों की धारणा पर भी असर डालता है।
किन सेक्टरों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा और किसे मिला फायदा?
बाजार में बिकवाली लगभग सभी क्षेत्रों में देखने को मिली। बैंकिंग, एफएमसीजी, ऑटो, तेल एवं गैस और मिडकैप शेयरों में दबाव सबसे अधिक रहा। एशियन पेंट्स, इंडिगो, बीपीसीएल, एचपीसीएल और इंडियन ऑयल जैसी कंपनियों के शेयर दबाव में रहे क्योंकि महंगा कच्चा तेल इनके मार्जिन पर असर डाल सकता है। दूसरी तरफ ओएनजीसी और ऑयल इंडिया जैसे तेल उत्पादन से जुड़ी कंपनियों को कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का लाभ मिलने की उम्मीद में निवेशकों का समर्थन मिला। कुछ दवा कंपनियों में भी खरीदारी देखी गई क्योंकि ऐसे सेक्टर वैश्विक तनाव के दौरान अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते हैं।
निवेशकों को अब किन संकेतों पर नजर रखनी चाहिए?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आगे क्या होगा? निवेशकों को सबसे पहले अमेरिका और ईरान के बीच घटनाक्रम पर नजर रखनी होगी। यदि तनाव और बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है। इसके साथ ही विदेशी निवेशकों की गतिविधि, रुपये की चाल, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और भारत में अस्थिरता सूचकांक (India VIX) भी बाजार की दिशा तय करेंगे। यदि भू-राजनीतिक तनाव कम होता है तो बाजार में राहत की वापसी संभव है। लेकिन यदि हालात बिगड़ते हैं तो निकट अवधि में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।
निष्कर्ष
शेयर बाजार में आई यह गिरावट केवल एक दिन की बिकवाली नहीं, बल्कि वैश्विक अनिश्चितता पर निवेशकों की प्रतिक्रिया है। फिलहाल सबसे बड़ा जोखिम पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतें हैं, जो भारत की अर्थव्यवस्था और कॉरपोरेट मुनाफे पर असर डाल सकती हैं। सबसे बड़ा अवसर उन निवेशकों के लिए हो सकता है जो मजबूत कंपनियों में लंबी अवधि का नजरिया रखते हैं और गिरावट के दौरान चरणबद्ध निवेश करते हैं। आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान संबंध, कच्चे तेल की चाल, विदेशी निवेशकों का रुख और रुपये की स्थिति बाजार की दिशा तय करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।