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भारत के बैंकिंग क्षेत्र से एक दिलचस्प लेकिन चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। एक तरफ बैंक धोखाधड़ी के मामलों की संख्या में बड़ी गिरावट दर्ज हुई है, वहीं दूसरी तरफ इन मामलों में शामिल रकम पिछले तीन वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में बैंक धोखाधड़ी के कुल मामले 57 प्रतिशत से अधिक घट गए, लेकिन धोखाधड़ी की कुल राशि बढ़कर ₹48,021 करोड़ हो गई। यह स्थिति बताती है कि बैंकिंग प्रणाली में छोटे स्तर की धोखाधड़ियों पर नियंत्रण तो मजबूत हुआ है, लेकिन बड़े मूल्य वाले ऋण घोटाले अब भी वित्तीय व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं। निवेशकों, बैंकों और नियामक संस्थाओं के लिए यह रिपोर्ट कई महत्वपूर्ण संकेत छोड़ती है।
मामलों की संख्या घटी, लेकिन रकम ने तोड़े रिकॉर्ड
आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में कुल 10,114 धोखाधड़ी मामले दर्ज किए गए। पिछले वित्त वर्ष में यह संख्या 23,722 थी। हालांकि मामलों की संख्या आधी से भी कम हो गई, लेकिन धोखाधड़ी की कुल राशि 46.4 प्रतिशत बढ़कर ₹48,021 करोड़ पहुंच गई। तुलना करें तो वित्त वर्ष 2023-24 में यह राशि केवल ₹11,013 करोड़ थी। यानी दो वर्षों में धोखाधड़ी की रकम चार गुना से अधिक बढ़ चुकी है। यह संकेत देता है कि अब कम संख्या में लेकिन बड़े मूल्य वाले मामले सामने आ रहे हैं।
पुराने मामलों ने बढ़ाया कुल नुकसान
आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़ों में ₹30,199 करोड़ मूल्य के 314 ऐसे मामले भी शामिल हैं जो पिछले वर्षों से जुड़े थे। सर्वोच्च न्यायालय के मार्च 2023 के फैसले के बाद बैंकों ने कई मामलों की दोबारा समीक्षा की और उन्हें नए सिरे से धोखाधड़ी के रूप में वर्गीकृत किया। इसी कारण इस वर्ष धोखाधड़ी की कुल राशि में असाधारण बढ़ोतरी दिखाई दी। यानी पूरी वृद्धि केवल नए घोटालों की वजह से नहीं, बल्कि पुराने मामलों की पुनर्गणना का भी बड़ा योगदान है।
ऋण घोटाले बने सबसे बड़ी चिंता
आरबीआई रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि बैंकों द्वारा दिए गए ऋण से जुड़े धोखाधड़ी मामले सबसे बड़ा जोखिम बनकर उभरे हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में ऋण श्रेणी से जुड़े धोखाधड़ी मामलों की कुल राशि ₹40,774 करोड़ रही। यह कुल धोखाधड़ी राशि का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा है। एक वर्ष पहले यह राशि ₹30,367 करोड़ थी। वहीं वित्त वर्ष 2023-24 में यह केवल ₹8,917 करोड़ थी। इस दौरान ऋण धोखाधड़ी के मामलों की संख्या भी बढ़कर 8,640 हो गई। यह दर्शाता है कि बड़े कॉरपोरेट ऋण और व्यावसायिक कर्ज अब भी बैंकिंग क्षेत्र के लिए सबसे संवेदनशील क्षेत्र बने हुए हैं।
सरकारी बैंकों पर सबसे अधिक असर
रिपोर्ट के अनुसार सरकारी बैंकों में धोखाधड़ी की राशि सबसे अधिक रही। वित्त वर्ष 2025-26 में सरकारी बैंकों ने ₹35,709 करोड़ की धोखाधड़ी दर्ज की, जो कुल धोखाधड़ी राशि का लगभग 75 प्रतिशत है। हालांकि मामलों की संख्या घटकर 5,418 रह गई, लेकिन रकम में तेज बढ़ोतरी दर्ज हुई। दूसरी ओर निजी बैंकों में धोखाधड़ी की राशि ₹11,399 करोड़ रही। निजी बैंकों ने कुल मामलों का लगभग 39 प्रतिशत हिस्सा रिपोर्ट किया, लेकिन रकम के लिहाज से उनकी हिस्सेदारी 24 प्रतिशत से कम रही। इससे साफ है कि बड़े मूल्य के मामलों का बोझ मुख्य रूप से सरकारी बैंकों पर पड़ा है।
डिजिटल भुगतान में बड़ा सुधार
जहां ऋण धोखाधड़ी बढ़ी है, वहीं डिजिटल भुगतान से जुड़े मामलों में राहत देखने को मिली है। कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग और डिजिटल भुगतान से संबंधित धोखाधड़ी के मामले तेजी से घटे हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में ऐसे केवल 293 मामले दर्ज हुए, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 13,332 थी। धोखाधड़ी की राशि भी ₹517 करोड़ से घटकर मात्र ₹29 करोड़ रह गई। यह सुधार बैंकिंग क्षेत्र में बढ़ती साइबर सुरक्षा, बेहतर निगरानी व्यवस्था और ग्राहकों के बीच जागरूकता बढ़ने का परिणाम माना जा रहा है।
आरबीआई की नई रणनीति क्या है?
बढ़ती वित्तीय धोखाधड़ी को देखते हुए आरबीआई कई नई सुरक्षा व्यवस्थाओं पर काम कर रहा है। केंद्रीय बैंक सभी डिजिटल भुगतान माध्यमों में "चालू-बंद" सुविधा लाने पर विचार कर रहा है। इसके तहत ग्राहक जरूरत पड़ने पर अपने खाते से सभी डेबिट लेनदेन तुरंत रोक सकेंगे। इसके अलावा साइबर सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए विशेष निगरानी प्रणाली, वास्तविक समय में जोखिम विश्लेषण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित जांच तंत्र विकसित किए जा रहे हैं। आरबीआई का मानना है कि भविष्य में बैंकिंग सुरक्षा केवल नियमों से नहीं बल्कि तकनीक आधारित निगरानी से मजबूत होगी।
निवेशकों के लिए क्या संकेत हैं?
यह रिपोर्ट निवेशकों के लिए मिश्रित संकेत देती है। सकारात्मक पक्ष यह है कि डिजिटल भुगतान धोखाधड़ी में उल्लेखनीय गिरावट आई है और बैंकों की निगरानी व्यवस्था पहले से मजबूत हुई है। लेकिन दूसरी ओर बड़े ऋण घोटालों की बढ़ती राशि चिंता पैदा करती है। खासकर सरकारी बैंकों के लिए यह जोखिम अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। बैंकिंग शेयरों में निवेश करने वाले निवेशकों को केवल लाभ और विकास दर पर ही नहीं, बल्कि ऋण गुणवत्ता, फंसे कर्ज और जोखिम प्रबंधन पर भी नजर रखनी होगी।
निष्कर्ष:
आरबीआई की ताजा रिपोर्ट भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की दो अलग तस्वीरें दिखाती है। पहली तस्वीर यह है कि धोखाधड़ी के मामलों की संख्या तेजी से घट रही है, जो बैंकिंग व्यवस्था में सुधार का संकेत है। दूसरी तस्वीर यह है कि बड़े मूल्य वाले घोटाले अब भी वित्तीय प्रणाली को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ₹48,021 करोड़ की धोखाधड़ी राशि केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह बैंकिंग क्षेत्र के लिए चेतावनी भी है। आने वाले वर्षों में सफलता का पैमाना केवल मामलों की संख्या कम करना नहीं होगा, बल्कि बड़े ऋण घोटालों को रोकना भी होगा। निवेशकों के लिए संदेश स्पष्ट है भारतीय बैंकिंग क्षेत्र मजबूत हो रहा है, लेकिन जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। जो बैंक बेहतर जोखिम प्रबंधन, मजबूत ऋण मूल्यांकन और आधुनिक सुरक्षा तंत्र अपनाएंगे, वही भविष्य में निवेशकों का भरोसा जीत पाएंगे।