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देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक भारतीय स्टेट बैंक ने विदेशी मुद्रा जमा जुटाने के अभियान में बड़ी सफलता हासिल की है। बैंक ने एक महीने पहले शुरू की गई विशेष विदेशी मुद्रा जमा योजना के तहत 1.5 अरब डॉलर से अधिक की राशि जुटा ली है। यह उपलब्धि ऐसे समय में आई है जब भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत बनाने के लिए बैंकों को विशेष सहायता प्रदान कर रहा है। आकर्षक ब्याज दरों, जोखिम सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों के बढ़ते भरोसे ने इस योजना को तेज गति दी है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह रफ्तार बनी रहती है तो आने वाले महीनों में देश के विदेशी मुद्रा भंडार को और मजबूती मिल सकती है। साथ ही, यह कदम भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के लिए कम लागत पर विदेशी पूंजी जुटाने का प्रभावी माध्यम भी बन सकता है।
प्रवासी भारतीयों से मिला मजबूत समर्थन
एसबीआई की यह योजना खास तौर पर विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए शुरू की गई है। शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि प्रवासी भारतीयों ने इस योजना में बढ़-चढ़कर भाग लिया है और बैंक अब तक 1.5 अरब डॉलर से अधिक की विदेशी मुद्रा जमा जुटाने में सफल रहा है। दुनिया भर में लगभग 3.5 करोड़ भारतीय मूल के लोग रहते हैं। यही बड़ा आधार इस योजना की सबसे बड़ी ताकत माना जा रहा है। बैंक ने पश्चिम एशिया, सिंगापुर, लंदन और अन्य प्रमुख देशों में अपने संपर्क अभियान को तेज कर दिया है ताकि अधिक से अधिक निवेशकों तक पहुंच बनाई जा सके।
भारतीय रिजर्व बैंक की विशेष सहायता से बढ़ा आकर्षण
इस योजना की सफलता के पीछे भारतीय रिजर्व बैंक की अहम भूमिका भी मानी जा रही है। जून में केंद्रीय बैंक ने तीन से पांच वर्ष की विदेशी मुद्रा जमा पर जोखिम सुरक्षा की पूरी लागत अपने ऊपर लेने की घोषणा की थी। इस व्यवस्था का सीधा फायदा बैंकों को मिला है। जोखिम से जुड़ी लागत कम होने के कारण बैंक ग्राहकों को पहले की तुलना में अधिक आकर्षक ब्याज दरें देने में सक्षम हुए हैं। कुछ मामलों में निवेशकों को लगभग 7.5 प्रतिशत तक का प्रतिफल मिलने की संभावना बताई जा रही है, जिससे योजना की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है।
नौ गुना तक अतिरिक्त धन की सुविधा कैसे काम करती है?
इस योजना की सबसे खास विशेषता अतिरिक्त धन उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। जानकारी के अनुसार, एसबीआई पात्र ग्राहकों को उनकी जमा राशि के मुकाबले नौ गुना तक अतिरिक्त धन उपलब्ध कराने की सुविधा दे रहा है। सरल भाषा में समझें तो यदि कोई निवेशक अपनी एक निश्चित राशि जमा करता है, तो वह विदेश में अपेक्षाकृत कम ब्याज दर पर अतिरिक्त धन उधार लेकर भारत में अधिक राशि जमा कर सकता है। इससे उसे जमा पर मिलने वाला प्रतिफल उधार की लागत से अधिक मिल सकता है। यही कारण है कि यह योजना उच्च संपत्ति वाले निवेशकों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
ब्याज दरें भी बनीं बड़ी वजह
एसबीआई अपनी विदेशी मुद्रा जमा योजनाओं पर निवेश की राशि के अनुसार अलग-अलग ब्याज दरें दे रहा है। बैंक की जानकारी के अनुसार, 10 लाख डॉलर तक की तीन से पांच वर्ष की जमा पर लगभग 5.25 प्रतिशत से 5.75 प्रतिशत तक ब्याज दिया जा रहा है। वहीं इससे अधिक राशि की जमा पर ब्याज दर 5.5 प्रतिशत से 6 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। भारतीय रिजर्व बैंक की सहायता के कारण कुछ विशेष मामलों में निवेशकों को कुल प्रतिफल लगभग 7.5 प्रतिशत तक मिल सकता है। यही आकर्षक प्रतिफल इस योजना की मांग बढ़ाने वाला प्रमुख कारण माना जा रहा है।
बैंक अब सिर्फ बड़े निवेशकों पर नहीं कर रहे निर्भर
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में बैंक केवल बड़े निवेशकों तक सीमित नहीं रहेंगे। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, बैंक अब मध्यम वर्ग के प्रवासी भारतीयों को भी इस योजना से जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसी उद्देश्य से प्रमुख विदेशी शहरों में संबंध प्रबंधकों की नियुक्ति बढ़ाई जा रही है और डिजिटल माध्यमों से भी ग्राहकों तक पहुंच बनाने का प्रयास किया जा रहा है। यदि यह रणनीति सफल रहती है तो विदेशी मुद्रा जमा का आधार पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हो सकता है। 2013 की सफल रणनीति की याद फिर हुई ताजा
यह पहली बार नहीं है जब भारत ने विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए इस तरह की रणनीति अपनाई हो। वर्ष 2013 में वैश्विक वित्तीय अस्थिरता के दौरान भी ऐसी ही विशेष योजना लाई गई थी। उस समय भारतीय बैंकों ने लगभग 34 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई थी, जिससे रुपये पर पड़ रहे दबाव को कम करने में मदद मिली थी। मौजूदा योजना को उसी सफल मॉडल का आधुनिक रूप माना जा रहा है, हालांकि इस बार परिस्थितियां अलग हैं और उद्देश्य विदेशी मुद्रा भंडार को और मजबूत बनाना है।
विदेशी मुद्रा भंडार और बैंकिंग क्षेत्र पर क्या होगा असर?
यदि एसबीआई और अन्य बैंक इसी तरह विदेशी मुद्रा जमा जुटाने में सफल रहते हैं तो इसका सकारात्मक प्रभाव पूरे वित्तीय तंत्र पर दिखाई दे सकता है। विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होने से बाहरी आर्थिक झटकों का सामना करना आसान होगा और रुपये की स्थिरता को भी समर्थन मिल सकता है। साथ ही, बैंकों को अपेक्षाकृत सस्ती विदेशी पूंजी उपलब्ध होगी, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति मजबूत हो सकती है। आने वाले महीनों में यदि अधिक बैंक इस अभियान को तेज करते हैं, तो भारत को वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी विदेशी मुद्रा के मोर्चे पर अतिरिक्त मजबूती मिल सकती है।
निष्कर्ष
एसबीआई द्वारा केवल एक महीने में 1.5 अरब डॉलर से अधिक की विदेशी मुद्रा जमा जुटाना यह दिखाता है कि प्रवासी भारतीयों का भारतीय बैंकिंग प्रणाली पर भरोसा लगातार मजबूत हो रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक की सहायता, आकर्षक प्रतिफल और निवेशकों के लिए उपलब्ध विशेष सुविधाओं ने इस योजना को तेजी से सफल बनाया है। अब निवेशकों और बाजार की नजर इस बात पर रहेगी कि क्या यह अभियान 2013 जैसी बड़ी सफलता दोहरा पाता है। यदि मौजूदा रफ्तार जारी रहती है, तो यह पहल न केवल एसबीआई बल्कि पूरे भारतीय बैंकिंग क्षेत्र और देश के विदेशी मुद्रा भंडार के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित हो सकती है।