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कुछ दिन पहले हैदराबाद की एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसी बात कही जिसने पूरे देश को चौंका दिया। उन्होंने देशवासियों से अनुरोध किया कि वे एक साल तक सोना खरीदने से बचें। घर में चाहे कितने भी शादी-समारोह क्यों न हों, सोने की खरीद को टालें। यह कोई सामान्य बयान नहीं था। जब देश का प्रधानमंत्री खुद आगे आकर लोगों की खरीदारी की आदतों पर बात करे, तो यह समझना ज़रूरी हो जाता है कि आखिर वह कौन सी मजबूरी है जो सरकार को ऐसा कहने पर मजबूर कर रही है।
आयात शुल्क नहीं बढ़ाएगी सरकार फिर भी अपील क्यों?
अपील के ठीक अगले दिन सरकारी सूत्रों ने साफ कर दिया कि सोने और चांदी पर आयात शुल्क बढ़ाने की कोई योजना नहीं है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय कार्डों के उपयोग पर भी कोई पाबंदी नहीं लगाई जाएगी। तो फिर सवाल उठता है जब शुल्क नहीं बढ़ाना, कोई कानूनी बाधा नहीं डालनी, तो अपील किसलिए? दरअसल, यही इस पूरे मामले की असली पेचीदगी है। सरकार बाज़ार में सीधा दखल देने से बच रही है, लेकिन वह चाहती है कि लोग खुद समझदारी दिखाएं। इसके पीछे की वजह समझने के लिए हमें देश की आर्थिक तस्वीर को थोड़ा करीब से देखना होगा।
भारत और सोना : एक गहरा और महंगा रिश्ता
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता देश है। हर साल देश में सात सौ से आठ सौ टन सोने की मांग रहती है। इसमें से नब्बे प्रतिशत से ज़्यादा सोना विदेश से आता है, क्योंकि देश में सोने का खनन बेहद कम है। इस बार तो आंकड़े और भी चौंकाने वाले हैं। चालू वित्त वर्ष में भारत ने सोने के आयात पर करीब बहत्तर अरब डॉलर खर्च किए, जो पिछले साल से चौबीस प्रतिशत ज़्यादा है। देश के कुल आयात बिल का लगभग दस प्रतिशत हिस्सा अकेले सोने का है। सोचिए जब भी कोई भारतीय सुनार की दुकान पर जाकर सोना खरीदता है, तो उस सोने के लिए भारत को डॉलर चुकाने पड़ते हैं। और डॉलर की मांग बढ़ने का सीधा असर रुपये की कीमत पर पड़ता है।
ईरान युद्ध और तेल की मार : दोहरी मुसीबत
इस समय भारत एक नहीं, दो मोर्चों पर दबाव झेल रहा है। पहला मोर्चा है कच्चे तेल का। भारत अपनी जरूरत का अठासी प्रतिशत तेल बाहर से मंगाता है। ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष की वजह से होर्मुज़ जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे तेल की कीमतें सौ डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई हैं। इससे भारत का ऊर्जा आयात बिल काफी बढ़ गया है। दूसरा मोर्चा है सोने का। जब भी युद्ध या अनिश्चितता का माहौल होता है, लोग सोने को सुरक्षित निवेश मानकर उसकी खरीद बढ़ा देते हैं। नतीजा यह होता है कि सोने की कीमतें और आयात दोनों एक साथ बढ़ते हैं। इन दोनों का मिला-जुला असर यह हुआ है कि देश का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट रहा है। मई की शुरुआत में यह भंडार करीब छह सौ नब्बे अरब डॉलर रह गया, जो फरवरी में सात सौ अट्ठाईस अरब डॉलर था।
व्यापार घाटे का बढ़ता बोझ
सरल भाषा में कहें तो व्यापार घाटा तब होता है जब कोई देश जितना निर्यात करता है, उससे कहीं ज़्यादा आयात करता है। इस वित्त वर्ष के पहले ग्यारह महीनों में भारत का व्यापार घाटा तीन सौ दस अरब डॉलर से भी पार कर गया, जो पिछले साल इसी अवधि में दो सौ इकसठ अरब डॉलर था। यानी हम पहले से ज़्यादा खरीद रहे हैं और उतना बेच नहीं पा रहे। जब ऊपर से सोने का आयात बिल भी बढ़े और तेल भी महंगा हो, तो यह घाटा और चौड़ा होता जाता है। इसी का असर रुपये पर भी पड़ता है और विदेशी मुद्रा भंडार पर भी।
बाज़ार में मची खलबली सोने की कंपनियों पर असर
प्रधानमंत्री की अपील का असर शेयर बाज़ार में भी दिखा। टाइटन, कल्याण ज्वेलर्स, सेंको गोल्ड जैसी कंपनियों के शेयर दो दिनों में चौदह प्रतिशत तक गिर गए। बाज़ार को डर है कि सरकार आगे चलकर सोने के आयात पर नकेल कस सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक अपील नहीं, बल्कि आने वाली नीतियों का संकेत भी हो सकती है। हालांकि जानकार यह भी कहते हैं कि भारत में सोने की मांग संस्कृति और परंपरा से इतनी गहरी जुड़ी है कि इसे एक अपील से रातोंरात बदलना संभव नहीं।
आगे क्या कर सकती है सरकार?
विशेषज्ञों के अनुसार सरकार के पास कुछ विकल्प हैं विदेश में पैसा भेजने के नियम सख्त करना, विदेशी मुद्रा जमा योजना लाना, या आगे चलकर सोने पर शुल्क बढ़ाना। फिलहाल सरकार ने कोई सख्त कदम नहीं उठाया है, लेकिन यह चुप्पी स्थायी नहीं लगती।
निष्कर्ष:
भारतीय समाज में सोना केवल धातु नहीं है। यह संपदा है, परंपरा है, शादी-ब्याह की शान है, और कठिन समय में काम आने वाली बचत भी है। इसे एक झटके में छोड़ना न तो संभव है, न उचित। लेकिन जब देश का खज़ाना दबाव में हो, रुपया कमज़ोर हो, और विदेशी मुद्रा तेज़ी से घट रही हो, तो यह सोचना भी ज़रूरी है कि हमारी खरीदारी की आदतें देश की अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करती हैं। प्रधानमंत्री की यह अपील दरअसल एक बड़े सवाल की तरफ इशारा कर रही है क्या हम एक ऐसे देश के नागरिक के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं, जो अपनी ज़रूरतों का बड़ा हिस्सा बाहर से खरीदता है? सोने की यह चमक जितनी मनमोहक है, उतनी ही महंगी भी और यह कीमत अंततः पूरा देश चुकाता है।