तेल की महँगाई, भारत की परीक्षा

आर्थिक अनुशासन ही आज की असली रणनीति

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को दो महीने से अधिक हो चुके हैं और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के बाज़ार में उथल-पुथल थमने का नाम नहीं ले रही। फरवरी में जब यह तनाव शुरू हुआ था, तब कच्चे तेल की कीमत उनहत्तर डॉलर प्रति बैरल थी। मई आते-आते यह एक सौ चार डॉलर से ऊपर जा पहुँची। यह महज़ एक बाज़ार का उतार-चढ़ाव नहीं है यह भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर वित्तीय परीक्षा है। भारत अपनी कुल तेल ज़रूरत का लगभग पचासी फ़ीसद आयात करता है। ऐसे में जब वैश्विक कीमतें इस तेज़ी से बढ़ती हैं, तो असर सीधे आयात बिल पर पड़ता है, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव आता है और रुपये की स्थिरता खतरे में पड़ती है। सरकार ने इस पूरी स्थिति को ध्यान में रखते हुए ईंधन बचत को राष्ट्रीय अभियान का दर्जा दिया है। भंडार पर्याप्त है, लेकिन कीमत भारी है
सरकार ने स्पष्ट किया है कि भारत के पास अभी कच्चे तेल का साठ दिनों का, प्राकृतिक गैस का साठ दिनों का और रसोई गैस का पैंतालीस दिनों का भंडार उपलब्ध है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार सात सौ तीन अरब डॉलर पर टिका हुआ है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल शोधक देश है और एक सौ पचास से अधिक देशों को पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात करता है। यह आँकड़े यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि भारत किसी तात्कालिक आपूर्ति संकट में नहीं है। लेकिन असली समस्या आपूर्ति की नहीं, लागत की है। जब बाज़ार में तेल इतना महँगा हो, तो उसे खरीदते रहना राष्ट्रीय खजाने पर लगातार बढ़ता बोझ बन जाता है। इसीलिए सरकार ने बचत की अपील की है न इसलिए कि टंकियाँ खाली हैं, बल्कि इसलिए कि उन्हें भरना बेहद महँगा हो गया है।
तेल कंपनियाँ रोज़ हज़ार करोड़ का घाटा उठा रही हैं
भारत में पेट्रोल और डीज़ल की खुदरा कीमतें संघर्ष शुरू होने के बाद से नहीं बदली हैं। यह उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात है, लेकिन इस स्थिरता की एक बड़ी आर्थिक कीमत चुकाई जा रही है। सरकारी तेल विपणन कंपनियाँ इस समय रोज़ाना लगभग एक हज़ार करोड़ रुपये का घाटा उठाकर उपभोक्ताओं को महँगाई से बचा रही हैं। वर्ष 2026 की पहली तिमाही में यह कुल नुकसान लगभग दो लाख करोड़ रुपये तक जा पहुँचा है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि फ़िलहाल इन कंपनियों को कोई मुआवज़ा देने की योजना नहीं है। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि जितना अधिक ईंधन की माँग बनी रहेगी, उतनी बड़ी मात्रा में ये कंपनियाँ घाटे में रहेंगी। और यह घाटा अंततः सार्वजनिक धन पर बोझ बनता है वह धन जो स्वास्थ्य, शिक्षा या बुनियादी ढाँचे पर खर्च हो सकता था।
नागरिकों की बचत का सीधा आर्थिक अर्थ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से मेट्रो और सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग करने, कारपूलिंग अपनाने, अनावश्यक विदेशी यात्रा से बचने और एक वर्ष तक ग़ैर-ज़रूरी सोने की खरीद न करने की अपील की है। यह सुझाव आर्थिक दृष्टि से बिल्कुल तर्कसंगत हैं। जब कोई नागरिक निजी गाड़ी की बजाय मेट्रो से यात्रा करता है, तो पेट्रोल की माँग घटती है। माँग घटने से आयात कम होता है। आयात कम होने से डॉलर की ज़रूरत घटती है और रुपये पर दबाव कम होता है। इसी तरह, सोने का आयात भारत के डॉलर खर्च का एक बड़ा हिस्सा है। जब वैश्विक संकट हो, तब इस खर्च को टालना विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखने में सीधे योगदान देता है। किसानों से रासायनिक उर्वरकों का उपयोग पचास फ़ीसद कम करने और सौर ऊर्जा से चलने वाले सिंचाई पंप अपनाने की अपील भी इसी सोच का विस्तार है। उर्वरक बनाने और आयात करने में ऊर्जा की भारी खपत होती है। डीज़ल पंपों की जगह सौर पंप लगाने से कृषि क्षेत्र की तेल पर निर्भरता घटती है और साथ ही किसान की लागत भी कम होती है।
दीर्घकालिक रणनीति: नवीकरणीय ऊर्जा और आत्मनिर्भरता
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस पूरे प्रकरण को केवल एक संकट की तरह नहीं, बल्कि एक नीतिगत अवसर की तरह देखने की बात कही है। उन्होंने सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और अन्य नवीकरणीय स्रोतों में निवेश बढ़ाने, ऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता लाने और रणनीतिक भंडार क्षमता का विस्तार करने पर बल दिया। यह दिशा सही है। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की है। घरेलू एलपीजी उत्पादन तीस हज़ार से बढ़ाकर पचास हज़ार मीट्रिक टन किया जा चुका है। एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को गति दी जा रही है और हरित हाइड्रोजन पर काम आगे बढ़ रहा है। पेट्रोलियम सचिव नीरज मित्तल ने उचित ही कहा कि नब्बे दिनों का कच्चे तेल का भंडार बनाए रखना व्यावहारिक रूप से उचित नहीं है क्योंकि उसमें बड़ी पूँजी निष्क्रिय पड़ी रहती है। इसके बजाय सरकार रणनीतिक भंडार को व्यापारिक साझेदारी के रूप में इस्तेमाल करने के विकल्पों पर विचार कर रही है, ताकि पूँजी बेकार न रहे।
संकट को अनुशासन में बदलने का अवसर
आर्थिक विश्लेषण के नज़रिए से देखें तो वर्तमान संकट भारत के सामने एक दोहरी चुनौती है एक तरफ तत्काल वित्तीय दबाव को संभालना और दूसरी तरफ दीर्घकालिक ऊर्जा ढाँचे को मज़बूत करना। दोनों काम एक साथ करने की ज़रूरत है। तात्कालिक स्तर पर, जन-भागीदारी से ईंधन की माँग घटाना सबसे सस्ता और सबसे तेज़ उपाय है। दीर्घकालिक स्तर पर, नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश, घरेलू उत्पादन में वृद्धि और आयात विविधीकरण यही तीन स्तंभ भारत को भविष्य के झटकों से बचा सकते हैं। जो देश तेल संकटों से हर बार घबरा जाते हैं, वे अपनी नीतियाँ नहीं बदलते। जो देश इन संकटों को सीखने का अवसर मानते हैं, वे अपनी ऊर्जा व्यवस्था को धीरे-धीरे आयात-निर्भरता से मुक्त करते चले जाते हैं। भारत अभी उसी मोड़ पर खड़ा है। यह संकट बड़ा है, लेकिन अगर आर्थिक अनुशासन और रणनीतिक सोच के साथ इससे निपटा जाए, तो यही दौर भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की असली नींव बन सकता है।