There are no items in your cart
Add More
Add More
| Item Details | Price | ||
|---|---|---|---|

सोने को हमेशा अनिश्चित समय का सबसे भरोसेमंद निवेश माना जाता है। यही वजह है कि जब दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था लगातार 20 महीने तक अपने गोल्ड रिजर्व में बढ़ोतरी करती है, तो यह केवल एक आंकड़ा नहीं बल्कि वैश्विक वित्तीय बाजार के लिए बड़ा संकेत बन जाता है। जून में भी चीन के केंद्रीय बैंक ने सोना खरीदा और यह साफ कर दिया कि उसकी दीर्घकालिक रणनीति अभी भी कीमती धातु पर भरोसा बढ़ाने की है। इस खबर का असर सिर्फ चीन तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय सोना बाजार, केंद्रीय बैंकों की निवेश रणनीति, डॉलर की स्थिति और भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देशों की मांग पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। यही वजह है कि बाजार विशेषज्ञ चीन की हर नई खरीदारी पर करीब से नजर रख रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस खबर के बीच भारत और चीन के बाजार का रुख अलग-अलग दिखाई दे रहा है। भारत में ऊंची कीमतों के कारण सोने की मांग कुछ कमजोर हुई है, जबकि चीन में कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद खरीदारी धीरे-धीरे मजबूत होती दिख रही है। ऐसे में सवाल यह है कि चीन आखिर किस रणनीति पर काम कर रहा है और इसका असर निवेशकों पर कैसे पड़ सकता है?
आखिर पूरा मामला क्या है?
पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना के ताजा आंकड़ों के अनुसार जून 2026 के अंत तक देश का आधिकारिक गोल्ड रिजर्व बढ़कर 75.44 मिलियन फाइन ट्रॉय औंस पहुंच गया। मई के अंत में यह 74.96 मिलियन फाइन ट्रॉय औंस था। इसका मतलब है कि चीन ने लगातार 20वें महीने अपने भंडार में सोना जोड़ा है। हालांकि एक दिलचस्प तथ्य यह भी सामने आया। सोने की मात्रा बढ़ने के बावजूद उसके रिजर्व का कुल मूल्य घट गया। जून के अंत तक चीन के गोल्ड रिजर्व की कीमत लगभग 303.72 अरब डॉलर रही, जबकि मई में इसका मूल्य 340.75 अरब डॉलर था। इसकी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव रही।
चीन लगातार सोना क्यों खरीद रहा है?
यहीं से कहानी दिलचस्प हो जाती है। पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के कई केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा सोने में बदल रहे हैं। इसके पीछे कई रणनीतिक कारण हैं। पहला कारण वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता है। अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव, भू-राजनीतिक जोखिम और वैश्विक वित्तीय बाजार में बढ़ती अस्थिरता ने केंद्रीय बैंकों को सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर आकर्षित किया है। दूसरा कारण विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाना है। लंबे समय तक अधिकांश देशों ने अमेरिकी डॉलर आधारित परिसंपत्तियों पर अधिक भरोसा किया। अब कई देश इस निर्भरता को धीरे-धीरे कम करने की कोशिश कर रहे हैं और सोना इस रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है।
दुनिया के दूसरे केंद्रीय बैंक भी बढ़ा रहे हैं खरीदारी
चीन अकेला ऐसा देश नहीं है जिसने सोने पर दांव लगाया है। मई में दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने मिलकर 41 टन सोना खरीदा, जो नवंबर 2025 के बाद सबसे बड़ी मासिक खरीद रही। इस दौरान पोलैंड सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा। उसके केंद्रीय बैंक ने मई में 18 टन सोना खरीदा और वर्ष 2026 में अब तक कुल 64 टन खरीद चुका है। उसके पास अब लगभग 614 टन का गोल्ड रिजर्व है और वह 700 टन के लक्ष्य के करीब पहुंच चुका है। इसके अलावा उज्बेकिस्तान ने 9 टन, कजाकिस्तान ने 7 टन और सिंगापुर ने 4 टन सोना खरीदा। दूसरी ओर रूस और तुर्की ने अपने कुछ गोल्ड रिजर्व में कमी की। इन आंकड़ों से साफ है कि केंद्रीय बैंकों की रणनीति एक जैसी नहीं है, लेकिन कुल मिलाकर वैश्विक स्तर पर सोने की मांग मजबूत बनी हुई है।
भारत और चीन की मांग में क्यों दिख रहा है अंतर?
हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। भारत में ऊंची कीमतों ने खुदरा मांग पर दबाव बनाया है। कुछ समय के लिए कीमतों में गिरावट आने पर खरीदारी जरूर बढ़ी, लेकिन दोबारा तेजी लौटने के बाद ज्वैलरी बाजार फिर धीमा पड़ गया। देश के कई सर्राफा कारोबारियों का कहना है कि ग्राहक फिलहाल कीमतों में स्थिरता का इंतजार कर रहे हैं। त्योहारों का मौसम भी अभी दूर है, इसलिए आभूषणों की मांग सामान्य से कम बनी हुई है। इसके विपरीत चीन में बाजार का माहौल अपेक्षाकृत बेहतर रहा। वहां अंतरराष्ट्रीय कीमतों में नरमी के दौरान निवेशकों और खरीदारों ने दोबारा खरीदारी शुरू की। इससे संकेत मिलता है कि चीन में निवेशकों का भरोसा अभी भी सोने पर कायम है।
गोल्ड की कीमतों पर क्या पड़ सकता है असर?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें केवल मांग और आपूर्ति से तय नहीं होतीं। अमेरिकी केंद्रीय बैंक की ब्याज दर नीति, डॉलर की चाल, वैश्विक आर्थिक वृद्धि और भू-राजनीतिक घटनाएं भी कीमतों को प्रभावित करती हैं। हाल के दिनों में कमजोर अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों के बाद ब्याज दरों में तेज बढ़ोतरी की आशंका कम हुई है। इससे सोने को समर्थन मिला है। यदि चीन और अन्य केंद्रीय बैंक इसी तरह खरीदारी जारी रखते हैं तो वैश्विक मांग मजबूत रह सकती है, जिससे कीमतों को भी सहारा मिल सकता है। हालांकि यदि डॉलर मजबूत होता है या ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो सोने में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।
विशेषज्ञ क्या मानते हैं?
कमोडिटी बाजार से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीदारी सोने के लिए दीर्घकालिक सकारात्मक संकेत है। यह मांग निवेशकों की भावनाओं पर भी असर डालती है और बाजार में गिरावट के समय कीमतों को सहारा देने का काम करती है। लेकिन विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल केंद्रीय बैंकों की खरीदारी के आधार पर निवेश का फैसला लेना सही रणनीति नहीं होगी। निवेशकों को ब्याज दरों, डॉलर सूचकांक, वैश्विक महंगाई और आर्थिक वृद्धि जैसे संकेतकों पर भी नजर रखनी चाहिए।
निवेशकों को किन बातों पर नजर रखनी चाहिए?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आगे क्या होगा? यदि चीन आने वाले महीनों में भी लगातार सोना खरीदता रहता है और अन्य केंद्रीय बैंक भी इसी राह पर चलते हैं, तो वैश्विक गोल्ड मार्केट में मांग मजबूत बनी रह सकती है। दूसरी ओर अमेरिका की मौद्रिक नीति, डॉलर की दिशा और अंतरराष्ट्रीय तनाव सोने की कीमतों की चाल तय करेंगे। निवेशकों के लिए सबसे बड़ा अवसर यह है कि केंद्रीय बैंकों की मजबूत खरीदारी लंबी अवधि में सोने को सहारा दे सकती है। वहीं सबसे बड़ा जोखिम यह है कि यदि वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेजी लौटती है, डॉलर मजबूत होता है या ब्याज दरें उम्मीद से अधिक समय तक ऊंची रहती हैं, तो सोने की कीमतों पर दबाव आ सकता है। इसलिए केवल कीमतों की तेजी देखकर निवेश करने के बजाय वैश्विक संकेतों, केंद्रीय बैंकों की अगली खरीदारी और आर्थिक आंकड़ों का इंतजार करना अधिक समझदारी होगी। यही आने वाले महीनों में गोल्ड मार्केट की दिशा तय करने वाले सबसे अहम कारक होंगे।